पंजीकृत न होने के बावजूद खरगे पर आरएसएस कर सकता है मानहानि का मुकदमा : न्यायालय

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बेंगलूरु। बेंगलूरु की एक विशेष अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि पंजीकृत संगठन न होने के बावजूद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के व्यक्तिगत सदस्य मानहानि का मुकदमा कर सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि केवल औपचारिक पंजीकरण या सदस्यता के दस्तावेजी सबूत न होने के आधार पर ऐसी शिकायतों को शुरुआत में ही खारिज नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने यह फैसला तब सुनाया, जब 42वें अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने एक आरएसएस स्वयंसेवक की निजी शिकायत पर संज्ञान लिया। इस शिकायत में कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे और कांग्रेस नेता मोहम्मद हारिस नलपाद पर आरएसएस के खिलाफ टिप्पणी करने का आरोप है।

अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 356 के तहत दोनों को समन जारी किया, जबकि कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडू राव के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी। बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि शिकायतकर्ता का इस मामले में कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि आरएसएस का कोई औपचारिक सदस्यता ढांचा या पंजीकृत दर्जा नहीं है।

न्यायालय ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि बीएनएस के तहत ‘व्यक्ति’ की परिभाषा में व्यक्तियों का एक संघ या निकाय शामिल है, चाहे वह पंजीकृत हो या न हो। न्यायालय ने कहा कि जहां मानहानिकारक बयान किसी पहचान योग्य संगठन के खिलाफ दिए जाते हैं, वहां उसके सदस्य भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत ‘पीड़ित व्यक्ति’ की श्रेणी में आ सकते हैं।

मजिस्ट्रेट ने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता वास्तव में आरएसएस का स्वयंसेवक है या नहीं, यह मुकदमा के दौरान तय होने वाला मामला है, न कि संज्ञान लेने के चरण में। न्यायालय ने कहा कि कानून में आपराधिक मानहानि की कार्यवाही शुरू करने से पहले किसी संगठन का पंजीकृत होना या उसके सदस्यों को जुड़ाव का दस्तावेजी सबूत देना अनिवार्य नहीं है।

उच्चतम न्यायालय, केरल उच्च न्यायालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि आरएसएस व्यक्तियों का एक निश्चित और पहचान योग्य निकाय है। इसलिए, अगर पूरे संगठन को निशाना बनाकर कोई टिप्पणी की जाती है, तो उसका कोई भी व्यक्तिगत सदस्य आपराधिक मानहानि की कार्यवाही शुरू कर सकता है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि बीएनएसएस के तहत प्रारंभिक सुनवाई का उद्देश्य कोई छोटा मुकदमा चलाना नहीं है। सदस्यता, मंशा और प्रतिष्ठा को हुए नुकसान से जुड़े विवादित सवालों पर फैसला सबूत पेश किए जाने के बाद ही होना चाहिए।

अदालत ने बचाव पक्ष की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें आरएसएस स्वयंसेवक की तुलना किसी सार्वजनिक हस्ती के महज एक प्रशंसक या मुरीद से की गई थी। न्यायालय ने कहा कि किसी संगठित निकाय से जुड़ाव का दावा करने वाले व्यक्ति की अलग कानूनी स्थिति होती है, हालांकि उस जुड़ाव की सटीक प्रकृति क्या है, यह मुकदमे के दौरान तय होने वाला मामला है।

यह शिकायत अक्टूबर 2025 में आरएसएस को लेकर खरगे, नलपाद और गुंडू राव के बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ी है। अदालत ने जहां खरगे और नलपाद के खिलाफ कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत पाए, वहीं यह भी माना कि गुंडू राव की टिप्पणियां खरगे को मिली कथित धमकियों के संदर्भ में थीं।

अदालत ने कहा कि उनकी बातें एक संगठन के रूप में आरएसएस या उसके सभी सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मानहानि के दायरे में नहीं आतीं। अदालत ने खरगे और नलपाद को 21 जुलाई को न्यायालय में पेश होने का निर्देश दिया है।