तिरुवनंतपुरम। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के संवेदनशील डिजाइन दस्तावेजों के लीक होने और प्रतिबंधित तकनीकी जानकारी के डार्क वेब पर उपलब्ध होने के दावों ने भारत के रणनीतिक क्षेत्रों में साइबर गवर्नेंस की समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया है।
इंजीनियरिंग फिजिसिस्ट और औद्योगिक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ केएस मनोज ने अपने लेख साइबर गवर्नेंस : क्या यह चिंता का समय है? में कहा कि ऐसे मामलों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए, हालांकि बिना साक्ष्यों के केवल अटकलों पर भरोसा करने से बचना चाहिए।
मनोज ने कहा कि मुख्य सवाल यह है कि सार्वजनिक रूप से सामने आए दस्तावेज असली हैं या फर्जी और यदि वे प्रामाणिक हैं तो वे नियंत्रित माहौल से बाहर कैसे पहुंचे? उन्होंने ठेकेदारों और आपूर्ति शृंखलाओं में खामियों, अंदरूनी खतरों या संस्थागत सूचना शासन की कमियों को इसके संभावित कारण बताए।
इसके अलावा, उन्होंने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र से जुड़े पिछले डेटा एक्सपोजर का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित एजेंसियों को जनता का विश्वास बनाये रखने के लिए आधिकारिक और स्पष्ट रुख सामने रखना चाहिए।
मनोज के अनुसार भारत एआई, अंतरिक्ष, रक्षा प्रौद्योगिकी, परमाणु ऊर्जा, स्मार्ट ग्रिड और सेमीकंडक्टर निर्माण में तेजी से प्रगति कर रहा है, लेकिन इन तकनीकों से उत्पन्न संवेदनशील जानकारियों की सुरक्षा के लिए हमारे शासन तंत्र को भी उसी गति से विकसित होना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल किसी दस्तावेज पर गोपनीय या गुप्त का लेबल लगा देना ही सुरक्षा की गारंटी नहीं है। वास्तविक सुरक्षा के लिए मजबूत एन्क्रिप्शन, जीरो ट्रस्ट आर्किटेक्चर और तकनीकी सुरक्षा उपायों का होना अनिवार्य है।
उन्होंने जोर दिया कि साइबर गवर्नेंस का उद्देश्य केवल हैकिंग या डेटा चोरी रोकना नहीं है, बल्कि उभरते खतरों का पूर्वाभास लगाना और हमले की स्थिति में तंत्र को तुरंत बहाल करना है। रक्षा, बिजली, दूरसंचार और परमाणु ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाएं, स्वतंत्र ऑडिट और मजबूत नेतृत्व प्रतिबद्धता जरूरी है। यदि भारत को एक वैश्विक प्रौद्योगिकी दिग्गज के रूप में उभरना है, तो रणनीतिक जानकारी की सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न अंग मानना होगा।



