नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति चेक जारी होने की तिथि पर किसी पार्टनरशिप फर्म का सक्रिय भागीदार है, तो केवल चेक पर उसके हस्ताक्षर न होने के आधार पर वह परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (एनआई एक्ट) की आपराधिक कार्यवाही से बच नहीं सकता है।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की पीठ में याचिकाकर्ता ललित मोहन चंद्र भट्ट की याचिका पर मंगलवार को सुनवाई हुई। आदेश की प्रति बुधवार को उपलब्ध हुई। याचिकाकर्ता की ओर से याचिका दायर कर बाजपुर स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित वाद को रद्द करने की मांग की गई थी।
दरअसल यह पूरा मामला मेसर्स वैष्णवी फूड प्रोडक्ट फर्म द्वारा जारी 50 लाख रुपए के चेक के अनादर से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता अफ़सार अली के अनुसार छह जनवरी 2025 को जारी किया गया 50 लाख रुपए का चेक पर्याप्त राशि न होने के कारण बाउंस हो गया था।
याचिकाकर्ता ललित मोहन चंद्र भट्ट ने तर्क दिया कि वह चेक के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे और चेक पर राजेंद्र कुमार शर्मा तथा अनिल कुमार शर्मा के हस्ताक्षर थे। हालांकि, अदालत के समक्ष उपलब्ध दस्तावेजों और स्वयं याचिकाकर्ता के बयानों से यह स्पष्ट हुआ कि वह एक अप्रैल 2023 से फर्म में पार्टनर के रूप में शामिल हो चुके थे और चेक जारी होने की तिथि पर फर्म के रोजमर्रा के कामकाज और प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।
अदालत ने एनआई एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि पार्टनरशिप फर्म अपने साझेदारों से अलग कोई स्वतंत्र कानूनी इकाई नहीं होती और फर्म द्वारा किए गए अपराधों के लिए उसके व्यवसाय के संचालन के लिए सभी सक्रिय साझेदार प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार होते हैं।
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएनएस) 2023 की धारा 528 (पूर्ववर्ती सीआरपीसी की धारा 482) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करने से इनकार करते हुए कहा कि निचली अदालत ने सम्मन जारी करने में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं की है। इसके साथ ही याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार मामले की सुनवाई आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।



