अजमेर नगर निगम चुनाव : भाजपा की टिकटों की ‘रेवड़ी’ में जनाधार पीछे, आकाओं की पसंद आगे?

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कार्यकर्ताओं की मेहनत पर ‘पदाधिकारियों की किस्मत’ भारी?
एक पद-एक व्यक्ति का सिद्धांत भी दिखा बेअसर
अजमेर। अजमेर नगर निगम चुनाव की जंग अभी मतदान तक पहुंची भी नहीं है, लेकिन भाजपा में टिकट वितरण को लेकर सियासी तापमान जरूर चढ़ गया है। टिकटों की घोषणा के बाद अब पार्टी के भीतर ही यह सवाल तैरने लगा है कि आखिर टिकट का आधार जनाधार, जमीनी सक्रियता और जीत की संभावना था या फिर नेताओं की पसंद, राजनीतिक समीकरण और ‘आका संस्कृति’?

दिलचस्प बात यह है कि जिस भाजपा में संगठनात्मक अनुशासन, एक पद-एक व्यक्ति और बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता को महत्व देने की बात कही जाती है, वहीं टिकट वितरण में कुछ ऐसे नाम सामने आए हैं, जिन्हें लेकर पार्टी के भीतर ही सवाल उठाए जा रहे हैं।

सवाल यह भी है कि वर्षों से पार्टी के लिए जमीन तैयार करने वाले कार्यकर्ता टिकट की दौड़ में पीछे क्यों रह गए और संगठन में पद संभाल रहे कुछ चेहरों को चुनावी मैदान में उतरने का मौका कैसे मिल गया?

‘एक पद-एक व्यक्ति’ का सिद्धांत किस मोड़ पर हुआ पार्क?

भाजपा में एक व्यक्ति, एक पद की चर्चा लंबे समय से संगठनात्मक अनुशासन का हिस्सा रही है। लेकिन अजमेर में टिकट वितरण के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या चुनावी टिकट के सामने यह सिद्धांत भी ‘समायोजन’ का शिकार हो गया?

पार्टी के कुछ शहर पदाधिकारियों के टिकट हासिल करने से कार्यकर्ताओं में यह चर्चा तेज है कि संगठन का पद भी संभालिए और पार्षद बनने की दौड़ में भी शामिल रहिए—फिर सामान्य कार्यकर्ता आखिर जाए तो जाए कहां? कटाक्ष यही है कि भाजपा में शायद अब ‘एक पद-एक व्यक्ति’ की जगह ‘एक व्यक्ति-दो जिम्मेदारी’ का नया मॉडल चल पड़ा है।

ऐन मौके पर सूची… बगावत का डर

टिकट सूची जारी करने में अंतिम समय तक चली गोपनीयता ने भी कई सवालों को जन्म दिया। पार्टी के भीतर टिकट को लेकर संभावित बगावत की आशंका पहले से चर्चा में थी। राजस्थान के निकाय चुनावों में भाजपा द्वारा संभावित बागियों को साधने के लिए डैमेज कंट्रोल टीम तक बनाने की खबरें सामने आई हैं। अजमेर में भी सूची को लेकर अंतिम क्षणों तक असमंजस बना रहा। अब राजनीतिक चर्चा यह है कि सूची देर से जारी करना रणनीति थी या फिर अपने ही दावेदारों के विरोध से पार्टी नेतृत्व चिंतित था?

चन्द्रेश सांखला : परिवार के लिए टिकट, कार्यकर्ताओं के लिए सवाल

पूर्व पार्षद चन्द्रेश सांखला को लेकर भी टिकट वितरण के बाद चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक गलियारों में उनके परिवार को टिकट मिलने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह नहीं कि किसी परिवार को टिकट क्यों मिला, सवाल यह है कि क्या पार्टी में टिकट के लिए सामान्य कार्यकर्ता को भी वही अवसर और राजनीतिक संरक्षण उपलब्ध है जो प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों को मिलता दिखाई देता है?यही वह बिंदु है जहां भाजपा का ‘कार्यकर्ता आधारित संगठन’ होने का दावा और टिकट वितरण की तस्वीर आमने-सामने खड़ी नजर आती है।

अनिश मोयल और रछित कछावा पर भी उठ रहे सवाल

भाजपा के मीडिया प्रभारी अनिश मोयल और मंडल अध्यक्ष रछित कछावा, दुर्गेश डाबरा के टिकट को लेकर भी पार्टी के भीतर और बाहर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सवाल यह है कि क्या संगठन में पद संभालना टिकट की दौड़ में अतिरिक्त ‘वेटेज’ बन गया है? अगर जनाधार ही टिकट का सबसे बड़ा पैमाना है तो फिर जमीनी स्तर पर सक्रिय दूसरे दावेदारों का मूल्यांकन किस तराजू पर हुआ? और अगर संगठनात्मक पद ही टिकट की गारंटी बन रहा है तो फिर पार्टी के बाकी कार्यकर्ता सिर्फ झंडा उठाने और नारे लगाने के लिए हैं क्या? बेशक, अंतिम फैसला मतदाता करेगा। लेकिन टिकट वितरण ने सवाल जरूर पैदा कर दिए हैं।

भारती श्रीवास्तव का वार्ड बदलना भी चर्चा में

महिला मोर्चा जिलाध्यक्ष भारती श्रीवास्तव को उनके निवास क्षेत्र से दूर वार्ड 78 से चुनाव मैदान में उतारने की चर्चा भी राजनीतिक हलकों में है। वार्ड 78 शहर के अंतिम छोर की ओर माना जाता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्थानीय राजनीति, स्थानीय संपर्क और जमीनी पकड़ के बजाय संगठनात्मक पहचान को ज्यादा महत्व दिया गया है क्या? यदि कोई उम्मीदवार अपने ही राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र से दूर जाकर चुनाव लड़ता है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय मतदाताओं से जुड़ाव बनाने की होती है। अब देखना यह होगा कि संगठन का पद वार्ड की गलियों में कितने वोटों में तब्दील होता है।

सतीश बंसल को फिर पार्षद बनने का सपना

वार्ड 76 से सतीश बंसल को टिकट मिलने के बाद एक बार फिर पार्षद बनने की उनकी कोशिश चर्चा में है। यहां भी पार्टी के भीतर सवाल यही है कि टिकट वितरण में पुराने चेहरों को दोबारा मौका देने का पैमाना क्या रहा? भाजपा ने यदि पुराने अनुभव को प्राथमिकता दी है तो इसे रणनीति कहा जा सकता है। लेकिन यदि नए चेहरों और जमीनी कार्यकर्ताओं की दावेदारी को दरकिनार किया गया है तो नाराजगी भी स्वाभाविक है।

ज्ञान सारस्वत का चुनाव से हटना भी इसी माहौल के बीच

इसी चुनावी माहौल में भाजपा के पूर्व पार्षद ज्ञान सारस्वत का वीडियो जारी कर खुद और परिवार के किसी सदस्य के चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान करना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। उनके चुनाव से हटने के फैसले ने अजमेर उत्तर की राजनीति में चल रही चर्चाओं को नया मोड़ दिया है।

दूसरी ओर पूर्व मेयर धर्मेंद्र गहलोत के भाजपा से इस्तीफे ने भी चुनाव से पहले पार्टी के भीतर असंतोष की बहस को हवा दी है। ऐसे में टिकट वितरण को केवल नामों की सूची मानना शायद राजनीतिक तस्वीर को छोटा करके देखना होगा। असली कहानी टिकट पाने वालों से ज्यादा टिकट नहीं पाने वालों की नाराजगी में छिपी हो सकती है।

अब ‘रेवड़ी’ का हिसाब जनता करेगी

भाजपा ने किसे टिकट दिया, किसे नहीं दिया और किस समीकरण के तहत दिया-इसका जवाब पार्टी नेतृत्व के पास होगा। लेकिन लोकतंत्र में आखिरी हिसाब संगठन नहीं, मतदाता करता है। टिकट किसी नेता की सिफारिश से मिल सकता है, संगठनात्मक पद से मिल सकता है, राजनीतिक समीकरण से मिल सकता है या किसी ‘आका’ की पसंद से भी मिल सकता है।

लेकिन वोट?

वोट तो आखिर उसी को मिलेगा जिसे वार्ड का मतदाता अपना मानता है। इसलिए भाजपा की टिकटों की यह ‘रेवड़ी’ चुनावी नतीजों के बाद ही तय करेगी कि इसमें मेवा ज्यादा था या मिश्री। और यदि टिकट वितरण से नाराज कार्यकर्ता मैदान में उतरकर बागी बन गए तो पार्टी के सामने असली चुनौती विपक्ष नहीं, अपनों की नाराजगी होगी। क्योंकि चुनाव में सबसे खतरनाक मुकाबला वह नहीं होता जिसमें सामने कांग्रेस का प्रत्याशी हो…सबसे मुश्किल मुकाबला तब होता है, जब पार्टी का अपना कार्यकर्ता ही कह दे—‘टिकट आपका, वोट हमारा नहीं।’