
सबगुरु न्यूज-सिरोही। सिरोही नगर परिषद में भाजपा जबरदस्त बुरी तरह से हारी है। कभी भाजपा की स्थाई सत्ता के लिए जानी जाने वाली नगर परिषद में में एक बार फिर भाजपा को बेदखल कर दिया गया।
ओटाराम देवासी, लुंबाराम चौधरी और जिलाध्यक्ष रक्षा भंडारी के साथ इसका ठीकरा जिस पर संगठन में फूट रहा है वो है जिला महामंत्री गणपतसिंह राठौड़। सिरोही जिला मुख्यालय पर पार्टी की कमान उन्हीं के हाथों में थी वो यहां के प्रभारी थे। लेकिन, जो परिणाम आए उससे लग रहा है वो अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह से नाकाम रहे और उनके प्रति पार्टी के कार्यकर्ताओं में विश्वास का प्रमाण भी इससे मिलता है। जिले में संगठन के हर निर्णय में जिस तरह से उनको पुराने और सालों से जुड़े हुए कार्यकर्ताओं के सामने तवज्जो दी गई उसको लेकर भी स्थानीय नेताओं में आक्रोश देखने को मिलता रहा है। स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं की मानें तो ये सब जानते हुए भी मंत्री, सांसद और जिलाध्यक्ष ने जिस तरह से उन्हें हर फ्रंट पर आगे रखकर कार्यकताओं को चिढ़ाने के प्रयास किया उसका खामियाजा भी इस चुनाव में देखने को मिला।
– जिलाध्यक्ष के सबसे विश्वस्त
वर्तमान संगठन कार्यकारिणी में जिलाध्यक्ष रक्षा भंडारी के सबसे करीबी नेताओं में शुमार माने जाते हैं गणपत सिंह। सांसद लुंबाराम चौधरी और मंत्री ओटाराम देवासी ने भी करीबी बनाया हुआ है। गणपतसिंह मूल रूप से जालोर जिले के हैं। वो भले ही कितना भी स्थानीय होने का दावा करें यहां के नेता इन्हें स्थानीय नहीं मानते।
किसी भी कार्यक्रम और योजना में इन नेताओं द्वारा गणपतसिंह को तवज्जो देने और स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं को दरकिनार करने की टीस शिवगंज से मावल बोर्डर तक के नेताओं और कार्यकर्ताओं में है। ऐसे में शुरू से ही ये माना जा रहा था उनके नेतृत्व में नेताओं और कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ना भी नागवार गुजरेगा। जो सीटें आईं वो सांगठनिक कार्यकुशलता की बजाय कैंडिडेट्स की व्यक्तिगत प्रयास से आई। वहीं कांग्रेस यहां पर सेंट्रलाइज चुनाव लड़ी। पूर्व विधायक में पूर्ण विश्वास के कारण उसमें वो अविश्वास नहीं दिखा जो लुंबाराम चौधरी, ओटाराम देवासी और रक्षा भंडारी के नेतृत्व पर भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं के प्रति दिखा।
– शिवगंज में भी इज्जतदार जीत नहीं
सिरोही विधानसभा में शिवगंज नगर पालिका भी पड़ती है। यहां पर 35 वार्ड हैं बहुमत के लिए 18 सीटों की जरूरत थी और भाजपा को 18 ही सीटें मिलीं। यानि बोर्डर लाइन पर हैं। कांग्रेस को यहां 14 से मिली है और तीन निर्दलीय जीते हैं। यहां पर पालिकाध्यक्ष की सीट सामान्य के लिए आरक्षित है। जो जीतकर आए हैं उनमें भी अधिकांश में सांसद, मंत्री और जिलाध्यक्ष के प्रति वो आस्था तो कभी नहीं दिखी जो दिखनी चाहिए। यहां पालिकाध्यक्ष की दौड़ के लिए आधा दर्जन नाम सामने आ रहे हैं। यदि थोड़ी ऊँच-नीच हुई तो इतनी बोर्डर लाइन जीत से कब यहां का बोर्ड हाथ से खिसक जाए तो कह नहीं सकते।
चर्चा ये है कि आबूरोड में भी गणपतसिंह के करीबी नेता के परिजन को पालिकाध्यक्ष के रूप में प्रमोट करने की कोशिश की जा रही है। सामान्य सीट पर अन्य को प्राथमिकता देने को लेकर कांग्रेस और भाजपा का एक गुट बिल्कुल स्पष्ट निर्णय किया हुआ है कि वो ऐसा नहीं होने देंगे। आबुरोड जैसे बागियों की नगरी में यदि ऐसा होता है तो वहां भी धोखा है जाए इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। जिले से माउंट आबू में भाजपा की जीत को सम्मानित जीत कहा जा सकता है जहां पर भाजपा के साथ ऊंचनीच की संभावनाए कम ही हैं। लेकिन ये भी इस बात पर निर्भर करता है कि वहां पर पालिकाध्यक्ष का पद किसे दिया जाता है। अन्यथा माहौल तो वहां भी ऐसा है कि सही नाम सामने नहीं आने पर सत्ता बदलने पर कभी भी पिंडवाड़ा वाली स्थितियां बन जाएं।


