पहली होली पर नन्हें बच्चों की ‘डूढ’ रस्म धूमधाम से संपन्न

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अजमेर।
होली पर्व के अवसर पर शहर के विभिन्न मोहल्लों में नन्हें बच्चों की पारंपरिक डूढ की रस्म श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुई। विशेष रूप से अजमेर में यह परंपरा वर्षों से निभाई जा रही है, जिसमें पिछले एक वर्ष में जन्मे बच्चों की पहली होली पर यह शुभ संस्कार किया जाता है।

होलिका दहन के अवसर पर परिजन बच्चों को नए वस्त्र पहनाकर होलिका स्थल पर लेकर पहुंचे। विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर नारियल, गेहूं की बालियां और मिठाई अर्पित की गई। बुजुर्गों ने बच्चों की आरती उतारकर उनके उज्ज्वल भविष्य और स्वस्थ जीवन की कामना की।

डूढ की रस्म के दौरान परिवारजनों और रिश्तेदारों ने बच्चों को आशीर्वाद देते हुए उपहार भेंट किए। कई स्थानों पर सामूहिक रूप से कार्यक्रम आयोजित किए गए, जहां उत्साह और पारंपरिक लोकगीतों की गूंज सुनाई दी। यह रस्म न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और पारिवारिक परंपराओं को सहेजने का भी माध्यम है।

होली पर ‘डूढ की रस्म’ (कई जगह इसे डूंड/डूढ भी कहा जाता है) राजस्थान और खासकर अजमेर सहित आसपास के इलाकों में मनाई जाने वाली एक पारंपरिक रस्म है। यह रस्म विशेष रूप से उन बच्चों के लिए की जाती है जिनका जन्म पिछले एक साल में हुआ हो।

डूढ की रस्म क्या होती है?

यह एक शुभ संस्कार माना जाता है, जो बच्चे की पहली होली पर किया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चे को बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से बचाने तथा उसके अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करना होता है।

कब होती है?

यह रस्म होलिका दहन की शाम या उसके अगले दिन धुलंडी पर की जाती है।

कैसे की जाती है?

  1. बच्चे को नए कपड़े पहनाए जाते हैं।

  2. उसे परिवार के बड़े-बुजुर्ग गोद में लेकर होलिका के पास ले जाते हैं।

  3. नारियल, मक्के/गेहूं की बालियां, खिलौने या मिठाई होलिका में अर्पित की जाती हैं।

  4. बच्चे की आरती उतारी जाती है।

  5. कुछ जगहों पर होलिका की अग्नि की परिक्रमा करवाई जाती है।

  6. रिश्तेदार बच्चे को आशीर्वाद देते हैं और उपहार भी देते हैं।

सामाजिक महत्व

  • यह रस्म परिवार और समाज को एक साथ जोड़ती है।

  • बच्चे का समाज में औपचारिक ‘परिचय’ भी माना जाता है।

  • कई मोहल्लों में सामूहिक रूप से डूढ कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।