सवाई माधोपुर/टोंक। दीपावली का पर्व केवल रोशनी, खुशियों और लक्ष्मी पूजन तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान के कई क्षेत्रों में यह अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का भी विशेष अवसर है। इसी सांस्कृतिक परंपरा का निर्वहन करते हुए रविवार को सवाई माधोपुर में गुर्जर समाज सहित कई समुदायों के लोगों ने दीपावली की बड़ी अमावस्या पर सदियों पुरानी ‘छांट भरने’ की रस्म श्रद्धा और सामूहिक उत्साह के साथ निभाई।
इस अवसर पर शहर के चतुर्भुज तालाब सहित आसपास के जल स्रोतों पर समाज के लोग एकत्रित हुए। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने सामूहिक रूप से जल में अर्घ्य अर्पित कर अपने पितरों को याद किया और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। इस आयोजन के जरिए नई पीढ़ी को भी अपनी पारंपरिक संस्कृति और पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना से जोड़ने का संदेश दिया गया।
भगवान श्रीराम से जुड़ी है परंपरा की मान्यता
गुर्जर समाज में प्रचलित मान्यता के अनुसार समाज स्वयं को भगवान श्रीराम का वंशज मानता है। ऐसी धार्मिक धारणा है कि रावण वध के बाद भगवान श्रीराम ने अपने पूर्वजों का तर्पण किया था। इसी मान्यता से प्रेरित होकर गुर्जर समाज के लोग दीपावली की अमावस्या पर अपने पितरों का स्मरण करते हुए छांट भरने की परंपरा निभाते हैं।
सामान्यतः पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध कर्म पितृपक्ष में किए जाते हैं, लेकिन गुर्जर समाज में दीपावली के दिन सामूहिक रूप से यह रस्म निभाने की विशेष परंपरा है।
बेल पकड़कर सामूहिक रूप से करते हैं तर्पण
गुर्जर समाज धर्मशाला के अध्यक्ष रामकिशन मुकुल के अनुसार, बड़ी अमावस्या पर समाज के लोग अपने परिवार और गोत्र के सदस्यों के साथ तालाबों, नदियों तथा अन्य जल स्रोतों पर पहुंचते हैं। यहां रस्सी जैसी लंबी बेल को सामूहिक रूप से पकड़कर जल में अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसी पारंपरिक प्रक्रिया को छांट भरना कहा जाता है।
इस दौरान लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। परंपरा में सामूहिक भागीदारी का विशेष महत्व है। इसमें छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी शामिल होते हैं।
सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम
छांट भरने की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार और समाज को एक साथ जोड़ने का भी अवसर है। इस रस्म के माध्यम से नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों, पारिवारिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया जाता है।
सवाई माधोपुर में बड़ी अमावस्या पर देखने को मिला यह आयोजन बताता है कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी ग्रामीण और सामाजिक परंपराएं लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। पूर्वजों के प्रति सम्मान, सामूहिकता और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव का यह अनुष्ठान दीपावली के पर्व को एक अलग पहचान देता है।
टोंक में भी गुर्जर समाज ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा
दीपावली के अवसर पर गुर्जर समाज की सदियों पुरानी परंपरा छांट भरने की रस्म रविवार को श्रद्धा एवं उत्साह के साथ निभाई गई। जिला मुख्यालय की बनास नदी, ऐतिहासिक चतुर्भुज तालाब सहित जिलेभर के विभिन्न जलाशयों पर समाज के लोगों ने एकत्रित होकर अपने पूर्वजों का स्मरण किया और विधि-विधान से छांट भरकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। परंपरा के अनुसार समाज के लोगों ने सुबह स्नान करने के बाद बिना भोजन किए अपने परिवार एवं गोत्र के सदस्यों के साथ नदी और तालाबों पर पहुंचकर छांट भरने की रस्म अदा की।
इस दौरान पितरों की पसंद के अनुसार अग्नि में खीर, फल्के, मिठाई एवं विभिन्न पकवानों का भोग लगाया गया। परिवार के सभी सदस्यों ने पूर्वजों को याद कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। इस परंपरा की विशेषता यह रही कि इसमें नवजात शिशुओं से लेकर बुजुर्गों तक सभी पीढ़ियों ने भाग लिया। गोत्र एवं कुटुंब के लोग एक साथ उपस्थित होकर पारिवारिक एकता और पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना को प्रदर्शित करते नजर आए। मान्यता के अनुसार जलाशयों में रहने वाले जीव-जंतुओं को भी भोग खिलाया गया।



