आत्म मंथन ही ईश्वर की वास्तविक भक्ति : निरंकारी संत कान्ता सोलंकी

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अजमेर। सदगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से संत
निरंकारी मण्डल (संयोजक एवं प्रचारक) मारवाड कान्ता सोलंकी ने मधुरम गार्डन में शनिवार को आयोजित संयोजक स्तरीय निरंकारी संत समागम के दौरान सदगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के संदेश को अपने भाव उदगार करते हुए बताया कि ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के उपरांत हृदय से जब भक्त और भगवान का नाता जुड जाता है, तभी वास्तविक रूप में भक्ति का आरंभ होता है।

हमें स्वयं को इसी मार्ग की ओर अग्रसर करना है और साथ ही आत्म मंथन करने से अपनी बुराईयों की पहचान होती है। अहसास होता है कि भक्ति केवल एक तरफा प्रेम नहीं यह तो ओत-प्रोत होने वाली अवस्था है जहां भगवान अपने भक्त के प्रति अनुराग का भाव प्रकट करते हैं वहीं भक्त भी अपने हृदय में प्रेमाभक्ति का भाव रखते हैं। जीवन का जो सार तत्व है वह शाश्वान रूप मे यह निराकार प्रभु परमात्मा है। इससे जुडनेे के उपरांत जब हम अपना जीवन इस निराकार पर आधारित कर लेते हैं तो फिर गलती करने की संभावनाएं कम हो जाती हैं।

हमारी भक्ति का आधार यदि सत्य है तब फिर हम किसी भी संस्कृति में हमारा झुकाव किसी भी ओर हो यह मन सहजता से ही इस मार्ग की ओर अग्रसर हो जाता है। किसी संत की नकल करने की बजाए, जब हम सन्तों के जीवन से प्रेरणा लेते हैं तब जीवन में निखार आ जाता है। यदि हम किसी स्वार्थ पूर्ति के लिए ईश्वर की स्तुति करते हैं तो वह भक्ति नहीं कहलाती। भक्ति तो हर पल, हर कर्म करते हुए ईश्वर की याद में जीवन जीने का नाम है। यह एक हमारा स्वभाव बन जाना चाहिए।

माता सुदीक्षा के आशीर्वाद से राजस्थान के विभिन्न शहरों में आयोजित इन
सत्संगों के दौरान कई भाई, बहनों ने भी यह आव्हान किया भक्त जहां स्वयं की जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने जीवन को निखारता हैं, वहीं हर किसी के सुख-दुख में शामिल होकर यथा सम्भव उनकी सहायता करते हुए सबकी खुशियों का कारण बनते है। संत निरंकारी मण्डल अजमेर के इंचार्ज सुशील टाक ने आए हुए हजारों श्रद्धालुओ और भक्तों का आभार व्यक्त किया।