एक पार्षद, दो तस्वीरें, दो संदेश

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आबूरोड में कांग्रेस पार्षद द्वारा विकास कार्यों को लेकर दिए गए ज्ञापन को लेती अधिशासी अधिकारी और पालिकाध्यक्ष।

सबगुरु न्यूज-आबूरोड। कांग्रेस के पार्षद शमशाद आलम ने अपने वार्ड के कामों के लिए गुरुवार को नगर पालिका अध्यक्ष और अधिशासी अधिकारी को ज्ञापन सौंपा। उनकी ज्ञापन सौंपने की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होते ही दोनों तस्वीरों में ज्ञापन लेने वालों के गेस्चर पर सवाल उठने लगे। इससे पार्षदों के सम्मान के राजनीतिक शिष्टाचार को लेकर भी सवाल उठने लगा है। ये गेस्चर दो संदेश छोड़ रहे हैं। वो ये कि या तो वो राजनीतिक शिष्टाचार से अनभिज्ञ हैं या फिर विपक्षी पार्टी के जनप्रतिनिधियों के प्रति उनका ट्रीटमेंट कुछ अलग रहने वाला है।

– पालिकाध्यक्ष ने उठने की जहमत तक नहीं उठाई

यूं बसंत पंचमी नहीं थी लेकिन, संभवतः गुरुवार से जुड़ी आध्यात्मिक मान्यता से पालिकाध्यक्ष और अधिशासी अधिकारी सेम पिंच में थीं। लेकिन ये एकरूपता उनके ज्ञापन लेने वाली तस्वीरों में नहीं दिखी। अधिशासी अधिकारी कांग्रेस पार्षद से खड़े होकर ज्ञापन लेती नजर आईं तो पालिकाध्यक्ष बैठे बैठे। कांग्रेस के पार्षद के लिए भाजपा से चुनी गई पालिकाध्यक्ष का ये गेस्चर एक संदेश छोड़ रहा है।

– पहली बैठक में थे बचाव मुद्रा में

कांग्रेस के पार्षद शमशाद आबूरोड में संयम लोढ़ा के करीबी पार्षदों में माने जाते हैं। हाल में जब नगर पालिका की पहली बैठक हुई थी तब नीरज डांगी के करीबी पार्षदों के द्वारा प्रशासक काल में हुए टेंडर में भ्रष्टाचार और अनियमितता को लेकर उन्हें निरस्त करके नए टेंडर जारी करने की मांग कर रहे थे तो उनका विरोध करने में सबसे अग्रणी पार्षदों में शमशाद भी शामिल थे। विरोध को लेकर उनकी कथित दलील थी कि इससे विकास में देरी होगी। जबकि खुद संयम लोढ़ा ने नगर निकाय चुनाव में प्रशासक काल को भाजपा का शासन मानते हुए उसमें हुए कामों में जमकर भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाया हुआ था और उनके गुट के आबूरोड के पार्षद उसी भाजपा काल के टेंडरों के निरस्तीकरण के बाद बोर्ड के माध्यम से प्रस्ताव लेकर नए टेंडर जारी करवाने के विरोध में थे। जो कि एक तरह से भाजपा शासन के प्रशासक काल को क्लीन चिट देने जैसा था। इसके बावजूद पालिकाध्यक्ष का ये गेस्चर चर्चा का विषय था।

आजतक की तस्वीरों में कई संवेदनशील जिला कलेक्टर तक भी जनप्रतिनिधियों के द्वारा खड़े होकर ज्ञापन देने पर उसे खड़े होकर ही लेते हुए नजर आते दिखे हैं। पालिकाध्यक्ष के द्वारा अपने ही एक सहयोगी के द्वारा खड़े होकर दिए जाने वाले ज्ञापन के समय बैठे रहने को राजनीतिक और शासकीय शिष्टाचार के विपरीत देखा जा रहा है। माना ये भी जा रहा है कि पालिकाध्यक्ष को स्वास्थ्य कारणों से खड़े होने में समस्या थी तो तो पार्षद को भी कुर्सी उपलब्ध करवाकर बैठे हुए ज्ञापन लेकर राजनीतिक शिष्टाचार दिखा सकती थीं।