समलैंगिक विवाह को मान्यता का विरोध : सर्व महिला संस्कृति रक्षा मंच ने सौंपा ज्ञापन


अजमेर। राजस्थान के अजमेर में आज सर्व महिला संस्कृति रक्षा मंच ने सम लैंगिक विवाह को विधि मान्यता देने का पुरजोर विरोध करते हुए अजमेर जिलाधीशालय पर प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति के नाम का ज्ञापन देकर सरकार व सर्वाेच्च न्यायालय तक अपनी बात पहुंचाई। इस मौके पर हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया।

सर्व महिला संस्कृति रक्षा मंच से जुड़े सैकड़ों महिला पुरुषों ने इसका विरोध करते हुए प्रदर्शन में हिस्सा लिया और कहा कि समलैंगिक विवाह भारतीय मूल्यों में प्रकृति के विरुद्ध है। विवाह का मूल उद्देश्य शास्त्रों में मानव जाति की उन्नति एवं वृद्धि है। इसके विपरीत सम लैंगिक विवाह को मान्यता देने का अर्थ समाज में अप्राकृतिक एवं अनैतिक जीवन पद्धति को मान्यता देना होगा।

मंच ने ज्ञापन में कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने शीघ्रता एवं आतुरता में समलैंगिक व्यक्तियों के विवाह को विधि मान्यता देने का निर्णय लेने की तत्परता बताई है। भारत विभिन्न धर्मों जातियों उप जातियों का देश है इसमें शताब्दियों से केवल जैविक पुरुष एवं जैविक महिला के मध्य विवाह को मान्यता दी है सभी धर्मों में केवल विपरीत लिंग के दो व्यक्तियों के विवाह का उल्लेख है।

विवाह को दो अलग लैंगिकों के पवित्र मिलन के रूप में मान्यता देते हुए भारत का समाज विकसित हुआ है। विवाह एक सामाजिक कानूनी संस्था है जिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 246 के अंतर्गत सक्षम विधायिका द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग कर बनाया है। उसे कानूनी रूप से मान्यता प्रदान की और विनियमित किया गया किसी भी न्यायालयीन व्याख्या से विधायिका द्वारा दिए गए विवाह संस्था के मूर्त रूप को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।

समलैंगिक विवाह भारतीय मूल्यों में प्रकृति के विरुद्ध है। विवाह का मूल उद्देश्य हमारे शास्त्रों में मानव जाति की उन्नति व वृद्धि है। समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का अर्थ समाज में अप्राकृतिक एवं अनैतिक जीवन पद्धति को मान्यता देना होगा। पाश्चात्य देशों के मानदंडों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में लागू नहीं किया जा सकता। ऐसा कोई भी कृत्य जो सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करता हो उसे किसी भी प्रकार से भारत में मान्य नहीं किया जा सकता।

भारत में विवाह का एक सभ्यतागत महत्व है और एक महान और समय की कसौटी पर खरी उतरी वैवाहिक संस्था को कमजोर करने के किसी भी प्रयास का समाज द्वारा मुखर विरोध किया जाना चाहिए। हम समलैंगिक विवाह को विधि मान्यता देने का पुरजोर विरोध करते हैं।

समलैंगिकता का सर्वोच्च न्यायालय में इतना महत्त्व क्यों?

भादंवि कलम 377 हटाने के पश्चात भारत में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता मिलने के पश्चात अब समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की याचिका प्रविष्ट हुईं। इन याचिकाओं की नियमित सुनवाई होकर वह अब उन्हें इनका वर्गीकरण सर्वाेच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ में कर दिया गया है। एक सुनियोजित षड्यंत्र द्वारा समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का प्रयत्न शुरू है।

वैसे नियमित अभियोग, प्रलंबित निर्णय देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पास समय नहीं है; परंतु समलैंगिकता विषय के लिए न्यायालय के पास समय है। इस प्रकार से गलत कानून बनाकर पति-पत्नी के पवित्र विवाह बंधन के लिए संकट निर्माण किया जा रहा है। सरकार और समाज को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए कि समलैंगिक विवाह को मान्यता देकर इस देश को और अधिक पतन की ओर मार्गक्रमण आरंभ होगा, ऐसा प्रतिपादन सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाष झा ने किया। हिन्दू जनजागृति समिति द्वारा आयोजित समलैंगिकता का सर्वोच्च न्यायालय में इतना महत्त्व क्यों? इस ऑनलाइन ‘विशेष संवाद’में वे बोल रहे थे।

अधिवक्ता झा आगे बोले कि मूलत: समलैंगिकता चर्चा का विषय हो ही नहीं सकती; कारण समलैंगिकता एक रोग है जिससे समाज के कुछ वर्ग ग्रस्त हैं। जिस प्रकार कोरोना के लिए सरकार ने लस बनाई, उसी प्रकार इस रोग से ग्रस्त लोगों को इलाज की आवश्यकता है। कल देश के लाखों चोर कहने लगे चोरी करना हमारा संवैधानिक अधिकार है, तो उनका ऐसा संवैधानिक अधिकार हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार समलैंगिकता के विषय में भी है। समलैंगिकता के समर्थन में याचिका न्यायालय में प्रविष्ट करने वाले कौन हैं? इसका सरकार को पता लगाना चाहिए।

इतिहास की अध्ययनकर्ता मीनाक्षी शरण ने कहा कि समलैंगिकता रोम एवं ग्रीस देशों से आई विकृति है। इसी से एड्स रोग की उत्पत्ति हुई है। समलैंगिकता को मान्यता देकर पवित्र विवाह संस्था एवं कुटुंब व्यवस्था पर चारों ओर से आघात किए जा रहे हैं। हिन्दू धर्म में विवाह के समय पुरुष एवं स्त्री के मिलन को शिव-शक्ति का मिलन माना गया है। धर्म में जो चार ऋण बताए हैं, उनमें से पितृ ऋण चुकाने के लिए संतान की आवश्यकता होती है। वह केवल विवाह के माध्यम से ही साध्य हो सकता है। धर्म का योग्य पालन हो सकता है। वर्तमान में भटकी हुई युवा पीढी को समलैंगिकता के माध्यम से दिशाहीन करने का प्रयत्न किया जा रहा है। समाज में ऐसी अप्राकृतिक एवं गलत बातों का विरोध करने की आवश्यकता है।