नई दिल्ली। भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले पहले नागरिक हरीश राणा (31) का बुधवार सुबह दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में पूरे धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार किया गया। उनकी अंतिम यात्रा गहरे शोक और मौन के बीच संपन्न हुई।
हरीश ने 13 वर्षों से अधिक समय तक कोमा में रहने के बाद मंगलवार को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली। उनके परिवार ने 14 मार्च को उन्हें डॉ. बीआर अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर अस्पताल के पैलिएटिव केयर यूनिट में स्थानांतरित किया था, ताकि उनके अंतिम दिनों में उन्हें अधिकतम आराम मिल सके।
इससे पहले, गाजियाबाद स्थित उनका घर ही उनकी दुनिया बन गया था। एक ऐसी दुनिया, जहां शांत देखभाल, निरंतर निगरानी और अनकहा दर्द मौजूद था।
श्मशान घाट पर भावनाएं चरम पर थीं। सैकड़ों लोग-पड़ोसी, दोस्त, दूर के रिश्तेदार और यहां तक कि वे लोग भी, जिन्होंने उनकी कहानी सुनी थी-उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे।
कुछ लोगों की आंखों में आंसू थे, तो कुछ ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, लेकिन सभी का उद्देश्य एक ही था-उस युवा को अलविदा कहना, जिसकी लंबी और मौन पीड़ा ने पूरे देश को झकझोर दिया।
सुप्रीमकोर्ट ने 11 मार्च को एक संवेदनशील लेकिन मानवीय फैसला सुनाते हुए हरीश के इलाज को वापस लेने की अनुमति दी थी। अदालत ने माना कि लंबे समय से निष्क्रिय अवस्था में रहने के कारण उनके ठीक होने की लगभग कोई संभावना नहीं थी।
हरीश के पिता अशोक राणा ने एक ऐसे पिता का दर्द व्यक्त किया, जिन्होंने लंबे समय तक असंभव लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि हम इस लड़ाई को लड़ रहे थे। कोई भी माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसी स्थिति नहीं चाहेगा।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु, जिसमें जीवनरक्षक उपचार हटाकर मरीज को प्राकृतिक रूप से मृत्यु होने दी जाती है, हरीश के लिए अंतिम विकल्प बन गया था। उनका जीवन 2013 में एक गंभीर चोट के बाद लगभग ठहर गया था।
अदालत के निर्देश पर हरीश को एम्स में भर्ती कर जीवनरक्षक सहायता हटाने की प्रक्रिया पूरी चिकित्सा निगरानी में करने का आदेश दिया गया। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन हटाने की अनुमति दी, जो वर्षों की चिकित्सीय पुष्टि और कानूनी समीक्षा के बाद लिया गया निर्णय था।
फैसले के बाद अधिवक्ता मनीष जैन ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अदालत ने हरीश के गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी है। उन्होंने यह भी बताया कि यह फैसला 2018 के ऐतिहासिक मामले कॉमन कॉज बनाम भारत संघ 2018 निर्णय से प्रेरित है, जिसमें अपरिवर्तनीय और पैलिएटिव स्थिति वाले मरीजों की देखभाल के लिए दिशा-निर्देश तय किए गए थे।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु को दुनिया के कई देशों में मान्यता प्राप्त है, लेकिन भारत के लिए यह फैसला एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सुप्रीमकोर्ट ने सभी राज्यों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को प्राथमिक और द्वितीयक इच्छामृत्यु समीक्षा बोर्ड स्थापित करने और नियमित रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया है, ताकि ऐसे संवेदनशील मामलों में गरिमा, निगरानी और मानवीय दृष्टिकोण सुनिश्चित किया जा सके।



