नई दिल्ली। राज्यसभा ने गुरुवार को खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 को विपक्ष के हंगामे के बीच ध्वनिमत से पारित कर दिया। लोकसभा इस विधेयक को पहले ही पारित कर चुकी है जिससे इसे संसद की मंजूरी मिल गई है।
सदन ने विधेयक को प्रवर समिति में भेजने के द्रमुक के तिरूचि शिवा के प्रस्ताव तथा कुछ अन्य सदस्यों के विधेयक के प्रावधानों में संशोधन के प्रस्तावों को भी ध्वनिमत से नामंजूर कर दिया। कांग्रेस के सदस्य विधेयक पर चर्चा के दौरान राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर नारेबाजी करते रहे। खान मंत्री जी किशन रेड्डी के विधेयक पर संक्षिप्त चर्चा पर जवाब के बाद सदन ने विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया।
इससे पहले सभापति ने जरूरी विधायी दस्तावेज सदन के पटल पर रखे जाने के बाद सदस्यों को बताया कि संसदीय कार्य मंत्री किरेण रिजिजू ने सत्र का आज अंतिम दिन होने के मद्देनजर सुबह शून्यकाल और प्रश्नकाल की कार्यवाही की जगह खान और खनिज विधेयक को पारित कराने के प्रस्ताव का नोटिस दिया है। उन्होंने इस बारे में सदन की राय जानने के बाद रेड्डी को विधेयक पेश करने के लिए कहा। कांग्रेस और विपक्ष के अन्य सदस्यों ने इसका विरोध किया लेकिन सभापति ने विधेयक पर चर्चा शुरू करा दी।
रेड्डी ने चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि इस विधेयक के माध्यम से केन्द्र सरकार राज्यों के अधिकारोंं में कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि देश में रोजगार और विकास के लिए खनिज महत्वपूर्ण है और विधेयक के प्रावधानों से राज्यों को कोई नुकसान नहीं होगा और उनका राजस्व बढेगा। उन्होंने कहा कि केन्द्र को देशहित में खनिजों के विनियमन का अधिकार है। उन्होंने कहा कि विधेयक का उ्देश्य पूरे देश में कर और शुल्क की राशि में असमानता को खत्म कर एकरूपता लाना है।
उन्होंने राज्यों को आश्वस्त किया कि केन्द्र सरकार पूरी पारदर्शिता के साथ देश हित में काम करेगी और उनके अधिकारों में दखल नहीं दिया जाएगा। मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार सूक्ष्म खनिजों के मामले में दखल नहीं करेगी और वह केवल मुख्य खनिजों पर ही ध्यान देगी। उन्होंने कहा कि यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत को दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा करनी है।
उन्होंने पारदर्शिता पर जोर देते हुए कहा कि कांग्रेस के शासन में हर राज्य को कोयले से 65 प्रतिशत राजस्व मिलता था लेकिन राजग सरकार में यह बढकर 85 प्रतिशत हो गया है। विधेयक के माध्यम से राज्यों के खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्तियों पर पाबंदियां लगाई गई हैं।
विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के कथन में कहा गया है कि किसी उचित सीमा के अभाव में राज्यों द्वारा असमान रूप से कर और अन्य शुल्क लगाने से कई समस्याएं पैदा हुई हैं। इनमें खनन क्षेत्र पर कर का भारी बोझ, खनन कार्य शुरू होने के बाद अचानक और अप्रत्याशित रूप से कर, उपकर और अन्य शुल्क लागू कर देना, खनिज उत्पादन या उसके डिस्पैच पर कई तरह के कर और शुल्क लगाना, अलग-अलग राज्यों में कर की अलग-अलग दरें, और ऐसे कर तथा लेवी को पिछली तारीख से लागू करना शामिल है।
विधेयक में कहा गया है कि इन समस्याओं से खनन की लागत बढ़ती है, खनिजों की निकासी के काम को बढ़ावा नहीं मिलता और खनन कार्य व्यावसायिक रूप से अव्यावहारिक हो सकते हैं। यह विधेयक इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करता है।
इससे पहले तृणमूल कांग्रेस की सागरिका घोष ने विधेयक पर चर्चा की शुरूआत करते हुए कहा कि देश में स्वतंत्रता दिवस का माहौल है लेकिन गृह मंत्री सदन में नहीं आ रहे हैं और सदस्यों के सवालों का जवाब नहीं दे रहे हैं। भाजपा के तरूण चुघ ने खनिजों को देश के विकास में महत्वपूर्ण संसाधन बताते हुए विधेयक की आवश्यकता का प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह देश की आर्थिक प्रगति के लिए जरूरी है और यह साझी अमानत है तथा इसका देश के विकास और प्रगति के लिए इस्तेमाल जरूरी है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य के लिए भी यह जरूरी है।
बीजद के मानस रंजन मंगराज ने विधेयक का विरोध करते हुए इसे प्रवर समिति में भेजे जाने की मांग की। उन्होंने राज्यों के अधिकारों को कम करने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इससे राज्यों की वित्तीय स्थिति प्रभावित होगी। वाई एसआर कांग्रेस के येर्रम वेंकट सुब्बा रेड्डी ने खनन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए इसकी समीक्षा किए जाने की मांग की। अन्नाद्रमुक के एम तंबीदुरै ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार को राज्यों के अधिकारों की सुरक्षा करनी चाहिए। उन्होंने अवैध खनन पर भी रोक लगाने के लिए तंत्र विकसित किये जाने की मांग की।
आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि यह विधेयक परीक्षा की घड़ी है क्योंकि यह राज्यों के अधिकारों को छीनने का विधेयक है। यह उच्चतम न्यायालय के आदेश के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि यह राज्य सरकार के वित्तीय अधिकारों पर कुठाराघात है और चंद पूंजीपतियों को कोयला और खनिज ब्लाक देने के लिए लाया गया है।
राजद के मनोज झा ने उनकी बातों का समर्थन करते हुए विधेयक का विरोध किया और कहा कि यह संघवाद के खिलाफ है। उन्होंने सरकार से पूछा कि यह किसके इशारे पर लाया गया। उन्होंने कहा कि इसमें आदिवासी समुदाय और पर्यावरण की चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया गया है। बीआरएस के रविचंद्र वद्दीराजू ने विधेयक का समर्थन किया।
झामुमो की महुआ माजी ने विधेयक को केन्द्र के सौतेले व्यवहार का उदाहरण बताते हुए कहा कि इसमें राज्य के लोगों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। वहां के लोगों को भी इसका फायदा दिया जाना चाहिए। राज्य के वित्तीय अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। द्रमुक के एसआर शिवलिंगम ने भी विधेयक को प्रवर समिति को भेजने की मांग की।



