संत शिरोमणि रविदास के 650वें प्राकट्य वर्ष के उपलक्ष्य में एकात्म भारत और संत शिरोमणि रविदास व्याख्यान

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जयपुर। संत रविदास ने भक्ति के साथ कर्म को प्रधानता दी। उन्होंने समाज के लिए जन जागृति का कार्य किया उन्होंने तात्कालिक चुनौतियों का सामना कर समाज में सभी विचारों को एकीकृत किया जिसमें सगुण भी है और निर्गुण भी। संत रविदास जी ने कहा कि व्यक्ति पद या जन्म से महान नहीं होता कर्म से महान होता है।

ये विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजस्थान क्षेत्र प्रचारक निंबाराम ने व्यक्त किए। वे शनिवार को शैक्षिक मंथन संस्थान द्वारा संत शिरोमणि रविदास के 650वें प्राकट्य वर्ष के उपलक्ष में मॉडर्न स्कूल मानसरोवर में एकात्म भारत और संत शिरोमणि रविदास विषय पर आयोजित एक व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि संत रविदास (रैदास) 15वीं-16वीं सदी के महान संत, भक्त और समाज सुधारक थे उन्होंने मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी। काशी में जन्मे रविदासजी ने वैष्णव भक्ति, सामाजिक समानता और मानवीय प्रेम का संदेश दिया। इनके 40 पद ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में भी संकलित हैं। संत परंपरा में श्री रविदास जी का विशिष्ट स्थान है।

इन्होंने कर्मशील जीवन, श्रम की प्रतिष्ठा एवं शुद्ध सात्विक आचरण के साथ दीन’हीनों के प्रति सेवा भाव का संदेश दिया है तथा जन्म पर आधारित ऊँच- नीच के भेद को अस्वीकार करते हुए आचरण को ही जीवन का श्रेष्ठ का आधार माना। हमारी भारतीय संस्कृति में कर्म और कर्तव्य का महत्व रहा है। संत रविदास ने मुस्लिम राजा के अमानवीय कृत्य को स्वीकार किया परंतु इस्लाम स्वीकार नहीं किया। समतामूलक समाज की स्थापना की। उन्होंने संदेश दिया कि ईश्वर और भक्त का अटूट संबंध है।

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ नारायण लाल गुप्ता ने अध्यक्षीय उदबोधन में कहा कि संत रविदास, 15वीं शताब्दी में पूजनीय संत और समाज सुधारक थे। आज का यह पावन दिवस उनके जीवन, सामाजिक समानता, एकता और ईश्वर के प्रति अटूट भक्ति के उनके गहन संदेशों को श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित है। उनकी अमर विरासत पर चिंतन करने के लिए प्रेरणा लेनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि संत रविदास जी का संपूर्ण जीवन महाभारत का भाष्य रूप है। रविदास जी ने भारत के विचार को पुनर्परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि भारत में संत बचे तभी भारत और सनातन परम्परा बची। उन्होंने कहा कि संत रविदास जी का विचार सार्वभौमिक, समानता और ईमानदार जीवन पर आधारित उनका दर्शन, समुदायों को एक अधिक करुणामय विश्व की ओर प्रेरित करता रहता है।

यह विशेष अवसर हम सभी को एक क्षण रुककर एक असाधारण संत के गहन ज्ञान और अटूट समर्पण को सम्मान देने का आह्वान करता है, जिनके समानता और एकता के संदेश आज भी गहराई से महसूस किए जाते हैं। संत रविदास ने धन नहीं धर्म को, भोग के स्थान पर योग को प्राथमिकता दी। संत रविदास ने कहा कि प्राण तजूंपर, पर धर्म न देऊं। संत रविदास ने समरस, समर्थ एकात्म भारत की नींव रखी।

इससे पूर्व अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के अखिल भारतीय संगठन मंत्री महेंद्र कपूर ने शैक्षिक मंथन संस्थान का परिचय एवं वर्ष पर्यंत किए जा रहे कार्यों की रूपरेखा रखी। उन्होंने कहा कि शैक्षिक मंथन संस्थान, शिक्षा के क्षेत्र में गहन चिंतन तथा नवाचार को बढ़ावा देता है। यह कार्यशाला, प्रकाशन शोध और संगोष्ठियों का आयोजन करता है। इन्होंने अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ की रीति नीति,शिक्षकों के समाज के प्रति कर्तव्यों पर प्रकाश डाला।

धन्यवाद ज्ञापन मोहन पुरोहित ने किया। कार्यक्रम का संचालन शैक्षिक मंथन के सम्पादक डॉ शिवशरण कौशिक ने किया। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के प्रांतीय संगठन मंत्री डॉ दीपक कुमार शर्मा ने बताया कि इस कार्यक्रम में 500 से अधिक विश्वविद्यालय, महाविद्यालय तथा विद्यालयों के शिक्षकों सहित समाज के गणमान्य व्यक्तियों की सहभागिता रही।

कार्यक्रम के प्रारंभ में संत रविदास जी के जीवन पर आधारित वृत्त चित्र (डॉक्यूमेंट्री) का प्रदर्शन किया गया जिसमें संत रविदास जी का जीवन परिचय, व्यक्तित्व एवं शिक्षाओं, भक्ति तथा दर्शन उनके द्वारा समाज सुधार के लिए किए गए कार्यों का प्रदर्शन किया गया। संत रविदास की वाणी, पद एवं भक्ति मध्यकालीन भक्ति परंपरा में समाहित हैं। संत रविदास ने समता, सदाचार और स्वावलंबन का संदेश दिया और किसी भी कर्म को हीन नहीं माना।