नागपुर। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की ओर से भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बताए जाने वाले बयान को लेकर नागपुर के यशोधरा नगर पुलिस स्टेशन में सामाजिक कार्यकर्ता जनार्दन मून ने शिकायत दर्ज कराई है।
मून ने इन टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए इसे असंवैधानिक और भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत बताया है। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक संघ प्रमुख की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। शिकायत के अनुसार भागवत ने 29 अप्रैल को कहा था कि भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र है और इसे औपचारिक रूप से घोषित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
मून ने आरोप लगाया कि यह बयान धर्मनिरपेक्षता, समानता, धार्मिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता जैसे संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करता है और इससे सामाजिक वैमनस्य पैदा हो सकता है।
अपनी शिकायत में मून ने संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 14, 15 तथा 25 से 28 सहित विभिन्न प्रावधानों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि इस तरह के बयानों से सांप्रदायिक सदभाव बिगड़ सकता है और लोकतांत्रिक मूल्यों को ठेस पहुंच सकती है।
शिकायत में महात्मा गांधी, डॉ. बीआर अंबेडकर, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के योगदान का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि इन महापुरुषों ने एक ऐसे लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत की कल्पना की थी, जो सभी समुदायों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करे।
मून ने कहा कि राष्ट्र को किसी एक धर्म से जोड़ना संविधान की भावना और स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि भारत विविध धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं का देश है और संविधान से प्रदत्त ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र’ की अवधारणा ही देश की एकता की नींव है।
मून ने अपनी शिकायत में मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए और संबंधित बयान की संवैधानिक व कानूनी दृष्टिकोण से समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने मांग की कि भारतीय न्याय संहिता के लागू प्रावधानों के तहत उचित कानूनी कार्रवाई की जाए और उससे पहले देशद्रोह का मामला दर्ज किया जाना चाहिए।



