अजमेर। महर्षि नारद जयंती समारोह समिति अजयमेरु ने नारद जयंती के अवसर पर देश में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता जगत की चुनौतियां व उनका निवारण, देवर्षि नारद के जीवन चरित्र के संदर्भ सहित विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी के मुख्य वक्ता महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर सुरेश कुमार अग्रवाल थे।
कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि प्रज्ञा प्रवाह राजस्थान के सह संयोजक डॉ सत्यनारायण कुमावत, समिति अध्यक्ष सुनील दत्त जैन और मंत्री कवल प्रकाश किशनानी ने देवर्षि नारद व भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन कर की। भूपेंद्र उबाना ने मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया। समिति अध्यक्ष ने कार्यक्रम के उद्देश्य के बारे में बताया और देवर्षि नारद के सूचना के प्रवाह ही नहीं अपितु पत्रकारिता के माध्यम से जनकल्याण का मार्ग प्रशस्त करने पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि डॉ कुमावत ने कहा कि मीडिया के विभिन्न माध्यमों द्वारा देवर्षि नारद की छवि एक विदूषक की बना दी गई है। नारद अपनी संवाद कला में निष्पक्ष थे, वर्तमान में पत्रकारिता करने वालों को नारद के इसी गुण को सीखने की जरूरत है। पत्रकारों को तटस्थ होने की बजाय निष्पक्ष होना चाहिए। वे अपने कर्तव्य का पालन विश्व के कल्याण की भावना से करें। देश में पत्रकारिता, समाज व राष्ट्र को पश्चिमी संस्कृति से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।। इसमें पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है तथा वे निडरता पूर्वक और निष्पक्ष रूप से कार्य करें।
नारद जी के 84 भक्ति सूत्र आज भी पत्रकारिता की भगवद्गीता हैं, जिनसे प्रेरणा लेकर पत्रकारिता को सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, सर्वजन प्रबोधनाय और सर्वजन जागरणाय के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके।
देवर्षि नारद हमारे आद्य संवाददाता है। हमारे देश का राज्य चिन्ह सत्यमेव जयते सत्य की अभिव्यक्ति देता है, जो आज मीडिया के लिए एक दायित्व भी है। पत्रकारिता एक मिशन है जिसका कार्य समाज को दिशा देना, मार्गदर्शन करना है। आज इसमें गिरावट आ रही है। नारद के संवाद किसी विचारधारा, किसी दल विशेष के नहीं है। वे राजा, दानव, देव, इंद्र सभी की आंख में आंख डालकर लोकहित में संवाद करते हैं। व्यंग्य करते हुए अपनी बात कहते हैं। उनकी जीवन मूल्यों पर कोई प्रश्नचिंह नहीं लग सकता, लेकिन वर्तमान पत्रकारिता में जीवन मूल्यों का अभाव है।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि नारद जयंती वर्ष में एक बार मनाने वाला कार्यक्रम नहीं बल्कि वर्ष भर मनाने वाले कार्यक्रम होना चाहिए। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। हम इसके पाठक, श्रोता, दर्शक व उपभोक्ता हैं। समाज को आगे बढ़ाने वाला माध्यम मीडिया है। वर्तमान समय में मीडिया व समाज में एक संवादहीनता या कहें एक दूरी आ गई है जो दुर्भाग्यपूर्ण है। समाज में इस पर चर्चा नहीं हो पाती है। पिछले 300-400 सालों में मीडिया एक संगठित शक्ति के रूप में कार्य कर रहा है। समाज में क्या हो रहा है, हमें क्या दिखाना है, यह मीडिया के चिंतन का विषय है।
वर्तमान में पत्रकारिता करने वालों को भारत से सीखने की जरूरत है क्योंकि संवाद भारत की परंपरा है। वाद-विवाद और संवादहीनता की स्थिति क्यों आती है। नारद के पास पत्रकारिता की कोई डिग्री नहीं थी लेकिन आज की पत्रकारिता में संवेदना का अभाव है। समाज के लिए पीड़ा होनी चाहिए। उन्हें अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए कि मुझे क्या दिखाना है और क्या नहीं।
पत्रकारिता सप्तब्रह्म और नादब्रह्म का दुर्लभ संयोग है। मीडिया का लोकतंत्रीकरण समय की मांग हैं। हमारा व्यवहार कैसा है, उस पर नजर रखने की जिम्मेदारी मीडिया की है। विदेश में मीडिया द्वारा सत्य दिखाना अपना अधिकार अपने जिम्मेदारी मानी जाती है, वे लाइव दिखाते हैं, परिणाम क्या होगा यह हमारी जिम्मेदार नहीं है। संप्रेषण और संवाद में अंतर है, संप्रेषण सूचना को आगे भेजता है लेकिन संवाद में लोकहित जुड़ा हुआ है।
भारत में पत्रकारिता के मापदंड समाज से जुड़े हुए हैं। क्या प्रस्तुत करना क्या प्रस्तुत नहीं करना। ताज होटल पर हमले के समय हमने पत्रकारिता का एक अलग स्वरूप देखा, उसमें किसको फायदा हुआ यह विचारणीय प्रश्न है? हम सत्य तो दिखा रहे हैं, लेकिन क्या यह राष्ट्रीय हित में सही है? नर से नराधम होना सरल है, गिरना सरल है। नरोत्तम बनने के लिए साधना करनी पड़ती है। भारतीय पत्रकारिता साधना की पत्रकारिता है जो पब्लिक और पॉलिटी(सरकार) के मध्य सेतु का कार्य करती है।
नारद जी लोकहित की बात करते हैं। दुर्भाग्य से आज इसी बात का अभाव है। तेज सोच चाहिए कि तेज सूचना चाहिए। मीडिया से तटस्थता नहीं निष्पक्षता की उम्मीद करते हैं साथ ही विवेकता व लोकहित की भावना होनी चाहिए जो की सभी के हित में, समाज के हित में हो। शब्द को ब्रह्म कहा जाता है यदि शब्द ब्रह्म से भ्रम बन जाए तो यह चिंता का विषय है। आज सोशल मीडिया समाज की दशा व दिशा निर्धारित कर रहा है यह हमारे लिए सोचने का प्रश्न है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।
समिति के मंत्री ने अतिथियों व महानुभावों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि हमें हमारे नेतृत्व पर भरोसा होना चाहिए। आज हम भारत पाकिस्तान के मध्य हुए युद्ध विराम पर सरकार से ज्यादा विदेशी मीडिया भरोसा कर रहे हैं, जबकि हमें हमारी सरकार की बात का भरोसा करना चाहिए, यह पत्रकारिता नहीं है। आज हमें इसी पर विचार करने की आवश्यकता है। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम का संचालन भूपेंद्र उबाना ने किया।




