विश्वास की कसौटी पर फिर नीट : लीक के आरोपों ने दोबारा खड़े किए व्यवस्था पर सवाल

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नई दिल्ली। देशभर के लाखों मेडिकल उम्मीदवारों के लिए नीट-यूजी परीक्षा एक बार फिर निराशा और अनिश्चितता का सबब बन गई है। मंगलवार को राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने प्रश्न पत्र लीक के गंभीर आरोपों के बाद तीन मई 2026 को आयोजित परीक्षा रद्द करने का अभूतपूर्व फैसला लिया। इस बार इस परीक्षा में करीब 23 लाख छात्र बैठे थे।

यह पहली बार है, जब इस राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा को इसके वर्तमान स्वरूप में पूरे देश में निरस्त किया गया है, मगर विश्वास पर पहली बार संकट नहीं खड़ा हुआ है। वर्ष 2024 के बड़े विवाद के ठीक दो साल बाद आए इस संकट ने न केवल एनटीए की कार्यप्रणाली, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

ताजा विवाद राजस्थान के सीकर से जुड़े एक गेस पेपर के इर्द-गिर्द घूम रहा है। आरोप है कि परीक्षा से करीब एक महीने पहले ही केमिस्ट्री के लगभग 120 सवाल और बायोलॉजी के कई हिस्से लीक हो गए थे। अब इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दी है। एनटीए ने भी स्पष्ट कर दिया है है कि जांच पूरी होने और स्थितियों की समीक्षा के बाद ही परीक्षा की नई तिथि जारी की जाएगी।

मगर यह पहली बार नहीं है, जब नीट विवादों में फंसी है। इससे पहले 2024 में हजारीबाग (झारखंड) और पटना (बिहार) में पेपर लीक के आरोपों ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया था। उस वक्त भी जांचकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उम्मीदवारों ने परीक्षा से ठीक पहले हल किए गए प्रश्न पत्रों तक पहुंचने के लिए भुगतान किया था।

मामला सुप्रीमकोर्ट तक पहुंचा, जहां असामान्य रूप से बड़ी संख्या में छात्रों के शत-प्रतिशत अंक हासिल करने पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने हालांकि तब पूरी परीक्षा रद्द करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि सबूतों से ‘व्यापक संस्थागत चूक स्थापित नहीं हो पाया था। उस दौरान केवल उन 1,563 उम्मीदवारों के लिए पुन: परीक्षा आयोजित की गई थी, जिन्हें समय की हानि के लिए ‘ग्रेस मार्क्स’ दिए गए थे।

उसी वर्ष (2024) में परीक्षाओं की विश्वसनीयता का संकट इतना गहरा था कि यूजीसी-नेट को आयोजित होने के एक दिन बाद ही रद्द करना पड़ा था, जबकि नीट-पीजी और सीएसआईआर-यूजीसी नेट जैसी परीक्षाओं को स्थगित करना पड़ा था।

नीट के अस्तित्व में आने से पहले भी देश ने ऐसा ही मंजर 2015 में देखा था। तब सुप्रीमकोर्ट ने सीबीएसई के आयोजित ऑल इंडिया प्री-मेडिकल/प्री-डेंटल टेस्ट (एआईपीएमटी) को रद्द करने का ऐतिहासिक आदेश दिया था। उस समय जांचकर्ताओं ने एक संगठित नकल गिरोह का भंडाफोड़ किया था, जिसमें अभ्यर्थी ब्लूटूथ डिवाइस और माइक्रो-सिम वाली जैकेट का उपयोग कर रहे थे।

हरियाणा पुलिस के कम से कम 44 लाभार्थियों की पुष्टि करने के बाद अदालत ने दोबारा परीक्षा कराने का आदेश दिया था। उल्लेखनीय है कि नीट-यूजी ने 2016 में एआईपीएमटी की जगह ली थी।

शुरुआत में इसकी जिम्मेदारी सीबीएसई के पास थी, जिसे 2019 में एनटीए को हस्तांतरित कर दिया गया था। लेकिन 2024 के लीक विवाद से लेकर 2026 के पूर्ण रद्दीकरण तक के सफर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा की साख अब तक के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। लाखों छात्रों का भविष्य अब सीबीआई की जांच और आगामी पुन: परीक्षा की पारदर्शिता पर टिका है।