खतरनाक या आक्रामक कुत्तों को दी जा सकती है दयामृत्यु : सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आवारा कुत्तों के मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार से जोड़ते हुए अधिकारियों को आदेश दिया कि वे कानून के दायरे में रहकर पागल, लाइलाज और बेहद खतरनाक या आक्रामक आवारा कुत्तों को दयामृत्यु (यूथनेशिया) दे सकते हैं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमृत्यू एनवी अंजारिया की पीठ ने कुत्तों द्वारा काटने की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई। पीठ ने कहा कि देश भर में आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं खतरनाक रूप से बढ़ रही हैं। इनके परिणाम केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका इंसानी जिंदगी, समाज और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान से जीने के अधिकार में यह भी शामिल है कि हर नागरिक बिना किसी शारीरिक नुकसान, हमले या डर के सार्वजनिक स्थानों पर आ जा सके। नागरिकों को यह अधिकार है कि वे सार्वजनिक जगहों पर कुत्ता काटने जैसी जानलेवा घटनाओं के साये में न जिएं।

न्यायालय ने कहा कि जिन इलाकों में आवारा कुत्तों की आबादी बहुत ज़्यादा बढ़ गई है और हमले आम हो गए हैं, वहाँ अधिकारी जरूरी कदम उठा सकते हैं। इसके लिए पशु डॉक्टरों से जांच करानी होगी। इसके बाद पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) नियमों के तहत पागल, लाइलाज और खतरनाक कुत्तों को दयामृत्यु देने जैसे कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

इसके साथ ही, न्यायालय ने नेक नीयत से काम करने वाले सरकारी अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा भी दी है। पीठ ने कहा कि इन निर्देशों को लागू करने वाले अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी तभी दर्ज की जा सकती है, जब पहली नजर में उनके खिलाफ अधिकार के दुरुपयोग या दुर्भावना से काम करने का कोई ठोस मामला बनता हो।

न्यायालय ने देश में एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) नियमों को ठीक से लागू न करने पर कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि देश भर में नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम बहुत ढीले, कम बजट वाले और असमान रहे हैं। न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि अगर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने शुरुआत से ही अपनी नसबंदी क्षमता, टीकाकरण अभियानों और जरूरी बुनियादी ढांचे को बढ़ाने पर ध्यान दिया होता, तो आज स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती।

फैसले में कहा गया कि अगर राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों ने समझदारी दिखाते हुए शुरुआत से ही नियमों का पालन किया होता, तो आज हालात इतने बेकाबू नहीं होते। समय पर नसबंदी केंद्रों को बढ़ाना और लगातार टीकाकरण अभियान चलाना बेहद जरूरी था, जिसमें कमी रह गई।
बच्चों, बुजुर्गों और यहा तक कि विदेशी पर्यटकों पर आवारा कुत्तों के लगातार हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए न्यायालय ने कहा कि जब इंसानी जान को खतरा बढ़ रहा हो, तो सरकार या संवैधानिक अदालतें मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकतीं।

फैसले में कहा गया कि न्यायालय देश के अलग-अलग हिस्सों से आ रही दर्दनाक जमीनी हकीकतों से आंखें नहीं मूंद सकता। देश में छोटे बच्चों को आवारा कुत्तों द्वारा नोच डाला गया है, बुजुर्गों पर हमले हुए हैं, आम नागरिक सड़कों पर असुरक्षित हैं और विदेशी पर्यटक भी इन घटनाओं का शिकार बन रहे हैं।

न्यायालय ने राज्यों और प्रशासन को कई जरूरी निर्देश जारी किए हैं। पीठ ने कहा कि ‘एबीसी’ नियमों को सख्ती से लागू किया जाए और हर जिले में कम से कम एक पूरी तरह चालू नसबंदी (एबीसी) केंद्र खोला जाए। आबादी के हिसाब से इन केंद्रों की संख्या बढ़ाई भी जा सकती है। साथ ही जनता की सुरक्षा के लिए अन्य सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा बढ़ाने को लेकर समय सीमा के भीतर फैसले लिए जाएं।

न्यायालय ने राज्यों को अस्पतालों में एंटी-रेबीज दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। इसके अलावा, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को निर्देश दिया गया है कि वह राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा जानवरों की समस्या से निपटने के लिए एक विशेष निगरानी और समन्वय तंत्र बनाए।

एक बड़े निर्देश में न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों से कहा है कि वे इस फैसले और पुराने निर्देशों के पालन पर नजर रखने के लिए स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही दर्ज करें। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को सात अगस्त 2026 तक संबंधित उच्च न्यायालय के सामने अपनी अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी होगी।

आवारा कुत्तों के प्रबंधन का यह मुद्दा तब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था, जब उच्चतम न्यायालय ने पहले दिल्ली नगर निगम को आवारा कुत्तों को पकड़ने और शेल्टर होम में रखने का आदेश दिया था। उस समय पशु अधिकार संगठनों ने इसका विरोध किया था। बाद में तीन न्यायाधीशों की इसी पीठ ने उस आदेश को बदला और पूरा ध्यान नसबंदी, टीकाकरण और नियमों के तहत उन्हें वापस छोड़ने पर केंद्रित किया।

इससे पहले सात नवंबर 2025 को भी न्यायालय ने राजमार्गों, स्कूलों, अस्पतालों और अन्य संस्थागत परिसरों से आवारा जानवरों को हटाने का निर्देश दिया था। साथ ही बच्चों और मरीजों को हमलों से बचाने के लिए स्कूल-अस्पतालों में बाड़ लगाने का आदेश दिया था। इन निर्देशों को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करने के बाद न्यायालय ने मंगलवार को यह फैसला सुनाया।