
सबगुरु न्यूज-सिरोही। सिरोही नगर परिषद में लगे शहरी सेवा शिविर में कांग्रेस के निवर्तमान पार्षदों ने शिविर में प्रस्तावित पट्टे के काम में अनियमितता के आरोप लगाते हुए इस साल ठेके से पहले पौधे खरीदने के आरोप लगाये। जिन पौधों की बात कांग्रेस कर रही थी संभवतः वो मानसून के दौरान पिछले साल से हो रहे एक पेड़ मां के नाम अभियान की पूर्व तैयारी के लिए खरीदे जाने प्रतीत हो रहे हैं।
लेकिन, कांग्रेस के विधायक मोतीराम कोली के द्वारा विधानसभा में पूछे अतारांकित सवाल के माध्यम से जो जवाब आया है उसके अनुसार पिछले वर्ष सिरोही नगर परिषद में जितने पौधे खरीदे गए हैं उससे तो सिरोही शहर जंगल में तब्दील हो जाना चाहिए था। ऐसे में तो यहां पौधों की आवश्यकता की नहीं रहनी चाहिए। लेकिन इस बार भी आठ लाख पौधे खरीदने की निविदा जारी की है। इसी को लेकर कांग्रेस नेता आरोप लगा रहे थे कि पौधे पहले मंगवाये और टेंडर बाद में निकला गया है।
– 18 लाख के पौधे पिछले वर्ष
रेवदर के विधायक मोतीराम कोली ने विधानसभा के बजट सत्र में सिरोही जिले के पांचों नगर निकायों के 2023-24 और 2024-25 के दो लाख रुपए से ज्यादा के भुगतानों की सूची मांगी थी। इस सूची के अनुसार पिछले वर्ष सिरोही नगर परिषद ने ठेकेदार के माध्यम से खरीदे हुए पौधों के लिए साढ़े छह लाख रुपए का भुगतान किया था। उस समय भी टेंडर कम का था लेकिन, इसका बिल करीब चौदह लाख का बनाया गया। इस ठेके को लेकर पिछले साल विवाद हो गया तो इसका शेष भुगतान रोक दिया गया। सूत्रों के अनुसार इसे करीब साढ़े पांच लाख रुपए का भुगतान हाल ही में किया है। इसके अलावा विधानसभा से मिले जवाब में चार लाख रुपए के पौधों का भुगतान की एंट्री वन विभाग के नाम की भी है। इस तरह पिछले साल ही 18 लाख के पौधे सिरोही में लगाए गए हैं।
-कम से कम 60 हजार पौधे लगते
यूं तो साइज के अनुसार प्रति पौधे की वन विभाग की दरें निर्धारित हैं। लेकिन, प्रति पौधा की दर तीस रुपए भी माने तो इतनी राशि में 60 हजार पौधे आ जाते हैं। राजस्थान सरकार की वन विभाग के अनुसार नई पौधों की सर्वाइवल रेट 70-80 प्रतिशत है। इस हिसाब से दस वर्ग किलोमीटर के सिरोही शहर में 42-50 हजार पौधे पिछले साल के ही होने चाहिए। लेकिन पचास प्रतिशत भी सर्वाइवल रेट रही हो तो इतने में सिरोही नगर पालिका क्षेत्र में अब भी 30 हजार पौधों का जंगल दिखना चाहिए। जबकि, सिरोही के मुख्य मार्गों पर अभी भी नए पौधों का इतना घनत्व दिख ही नहीं रहा है।
हरित राजस्थान अभियान का नाम बदलकर भजनलाल सरकार ने एक पेड़ के मां के नाम कर दिया था। प्रधानमंत्री का दिया हुआ नाम है ये। अब यदि पिछले साल रोपे पौधों में से तीस हजार पौधे भी नहीं बचा पाए है तो इससे यही प्रतीत होता है कि मोदी जपनाम वाली भाजपा और प्रशासन प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी अभियान को लेकर गम्भीर नहीं है या फिर एक पेड़ मां के नाम अभियान में उतने पौधे लगाए ही नहीं हुए जितने का भुगतान किया गया है या फिर पौधे इतने महंगे खरीदे हैं कि इनकी कीमत पचास या सौ रुपए से भी पार चली गई है।


