नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मदरसों में अपनी नियुक्ति के लिए मान्यता की मांग करने वाले 350 शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ की याचिका सोमवार को खारिज कर दी।
पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम 2008 को कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल न्यायाधीश पीठ ने असंवैधानिक करार दिया था, जिसके बाद इन सभी की नौकरी चली गयी थी। न्यायालय ने बाद में इस फैसले को बरकरार रखा था। याचिकाकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि उनकी नियुक्ति स्थायी थी इसलिए उन्हें पश्चिम बंगाल की सहायता-अनुदान योजना के तहत तनख्वाह मिलनी चाहिए।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने संबंधित याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे सुनवाई योग्य नहीं हैं। शीर्ष अदालत में 361 से ज्यादा याचिकाकर्ताओं ने 40 से अधिक याचिकाएं दायर की थीं। शीर्ष अदालत ने मार्च 2016 के कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।
इससे पहले छह जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के कानून को संवैधानिक रूप से वैध बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि 13 याचिकाकर्ताओं के मामले पिछले आदेश के बाद उसके समक्ष रखे गए थे। शीर्ष अदालत ने कहा था कि अगर ये 13 याचिकाएं उसे राजी करने में सफल रहती हैं तो बाकी याचिकाकर्ताओं के दावों की भी जांच की जाएगी, हालांकि कोई भी याचिका न्यायालय को अपनी बात नहीं समझा सकी।



