बेंगलूरु। कर्नाटक हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ इस आधार पर तलाक नहीं मांग सकता कि उसकी पत्नी में दिलचस्पी खत्म हो गई है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि हिंदू विवाह एक संस्कार है, अनुबंध नहीं, जिसे किसी भी जीवनसाथी की मर्जी से खत्म किया जा सके।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1ए) के तहत पति की तलाक की अपील खारिज करते हुए न्यायमूर्ति डीके सिंह और न्यायमूर्ति टीएम नदफ की खंडपीठ ने कहा कि हिंदू कानून के तहत विवाह जीवन भर का बंधन होता है और इसे केवल इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि कोई एक जीवनसाथी अब इस रिश्ते को जारी नहीं रखना चाहता।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि हिंदू कानून के तहत विवाह एक संस्कार है और यह कोई अनुबंध नहीं है। एक बार जब दोनों पक्षों का विवाह हो जाता है, तो विवाह जीवन भर के लिए होता है और कोई भी व्यक्ति इस आधार पर शादी से अलग नहीं हो सकता कि उसकी दूसरे पक्ष के साथ विवाह में कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी है।
अदालत ने मैसूरु के पारिवारिक न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखा, जिसने पत्नी के दाम्पत्य अधिकारों की बहाली की याचिका को स्वीकार करते हुए पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी थी।
दिसंबर 2003 में अंतरजातीय प्रेम विवाह करने वाले इस जोड़े की एक बेटी है, जो अब लगभग बालिग हो चुकी है। 2019 में मुकदमेबाजी के पहले दौर के बाद पति ने नई याचिका दायर कर दावा किया कि दाम्पत्य अधिकारों की बहाली का निर्देश देने वाली डिक्री के बावजूद दोनों पक्षों ने एक साथ रहना शुरू नहीं किया है और यह शादी पूरी तरह से टूट चुकी है।
पत्नी ने हालांकि क्रूरता या आपसी अनबन के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसने अपने पति और उनके माता-पिता की देखभाल की है, कभी अलग रहने की जिद नहीं की और वह शादी को जारी रखने के लिए तैयार है।
पारिवारिक न्यायालय को क्रूरता का कोई सबूत नहीं मिला और उसने जिरह के दौरान पति की इस स्वीकारोक्ति को नोट किया कि उसने वैवाहिक जीवन केवल इसलिए दोबारा शुरू नहीं किया, क्योंकि अब उसकी ऐसा करने में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी।
उसकी अपील को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि पति स्वेच्छा से प्रेम विवाह करने, लगभग दो दशकों तक साथ रहने और एक बच्चे का पिता बनने के बाद प्रभावी रूप से अपने ही आचरण का अनुचित लाभ उठाने की कोशिश कर रहा था।
यह मानते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत केवल दिलचस्पी खत्म हो जाना तलाक का कानूनी आधार नहीं है, खंडपीठ ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया और अपील खारिज कर दी।



