जयपुर। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि आपसी सहमति और मध्यस्थता के जरिए विवादों का समाधान भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने आज यहां आयोजित राष्ट्रमंडल शांति मध्यस्थता सम्मेलन के दूसरे दिन मुख्य संबोधन में कहा कि इसकी जड़ें वेदों, प्राचीन इतिहास, कौटिल्य के विचारों और महात्मा गांधी के सिद्धांतों में मिलती हैं। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और रिश्तों को बनाए रखने का प्रभावी माध्यम है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि भारत में 2023 के मध्यस्थता अधिनियम से बहुत पहले से ही विवादों को बातचीत और सहमति के आधार पर सुलझाने की परंपरा रही है। हाल के वर्षों में विधायिका और न्यायपालिका ने मध्यस्थता व्यवस्था को और मजबूत किया है।
उन्होंने कहा कि रामायण, महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी मध्यस्थता के कई उदाहरण मिलते हैं। उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए कहा कि शासन के चार उपायों में सबसे पहले साम यानी समझाइश और संवाद को रखा गया है, जो मध्यस्थता की मूल भावना को दर्शाता है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधीजी ने अपने वकालत के जीवन में दो पक्षों के बीच समझौता कराने को सबसे संतोषजनक अनुभव बताया था। इससे स्पष्ट होता है कि आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की परंपरा भारत की संस्कृति में गहराई से समायी हुई है।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता का उद्देश्य केवल विवाद समाप्त करना नहीं, बल्कि रिश्तों को सुरक्षित रखते हुए सभी पक्षों के हितों के अनुरूप समाधान निकालना है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने लोगों से न्यायालय की लंबी प्रक्रिया में जाने से पहले संवाद और मध्यस्थता जैसे विकल्पों को अपनाने का भी आह्वान किया।



