बारिश में किसानों के लिए कमाई का सुनहरा मौका होता है। आम तौर ग्रामीण क्षेत्र में झाडियों पर इसकी बेल फैली नजर आती है। इसे कुदरत का करिश्मा ही कहें की बिना किसी अतिरिक्त देखभाल के ककोडा की बेल फल देने लगती है।
किसान अगर ककोड़ा की खेती करें तो इससे तगड़ा मुनाफा कमा सकते हैं। बरसात के मौसम में इसकी कीमत सामान्यतः 90 से 100 रुपए प्रति किलो तक रहती है। मांग बढ़ने पर यह 100 से 150 रुपए प्रति किलो या उससे अधिक के भाव पर भी बिक सकता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ककोड़ा को लाभकारी माना जाता है। इसका उपयोग सब्जी और अचार बनाने के साथ-साथ पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता है। इसके औषधीय गुणों के कारण बाजार में इसकी मांग सालभर बनी रहती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, ककोड़ा की बुवाई जून और जुलाई महीने में की जाती है। यह फसल गर्म और नम वातावरण में अच्छी तरह विकसित होती है। 27 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। खास बात यह है कि ककोड़ा की फसल बारिश के मौसम में भी अच्छी पैदावार देती है और अन्य सब्जियों की तुलना में कीटों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम देखा जाता है।
ककोड़ा की खेती के लिए जैविक पदार्थों से भरपूर रेतीली या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। खेत में जल निकासी की बेहतर व्यवस्था होना जरूरी है, क्योंकि अधिक पानी जमा होने से पौधों को नुकसान पहुंच सकता है। किसानों को पौधों की रोपाई करते समय उचित दूरी का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जिससे बेलों का विकास बेहतर हो सके।
सिंचाई की बात करें तो
मानसून के दौरान इस फसल को अतिरिक्त पानी की अधिक आवश्यकता नहीं होती।
रोपाई के बाद पहली सिंचाई करने के पश्चात केवल जरूरत पड़ने पर ही पानी देना चाहिए।
इससे खेती की लागत भी कम रहती है।
ककोड़ा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जल्दी तैयार होने वाली फसल है। बुवाई के लगभग 60 से 70 दिनों बाद किसान इसकी तुड़ाई शुरू कर सकते हैं। इसके अलावा एक बार लगाए गए पौधे कई वर्षों तक उत्पादन देते रहते हैं, जिससे किसानों को हर साल नई बुवाई का खर्च नहीं उठाना पड़ता।
किसानों के लिए सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान मानसून के मौसम में कम लागत और बेहतर लाभ वाली खेती करना चाहते हैं, तो ककोड़ा एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। उचित खेत प्रबंधन और समय पर देखभाल के साथ किसान इस फसल से बेहतर उत्पादन और अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं।