
आबूरोड। निकाय चुनावों को लेकर लाॅटरियां हो गई। चुनाव की तिथि की घोषणा हो गई और आचार संहिता भी लग गई है। आबूरोड में अभी सभापति पद के दावेदार अपने वार्डों की तलाश में लगे हुए हैं। लेकिन, ये तय है कि हर बार की तरह इस बार भी बाजार में केंडिडेट्स की भरमार होगी। आबूरोड की नगर पालिका की पालिकाध्यक्ष की सीट सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने के बाद अब ये कवायद की जा रही है कि कौन नेता अपनी मां, बहन, पत्नी, भाभी का कहां से लडवाएगा। जो महिला खुद राजनीति में सक्रिय हैं उनमें से अधिकांश के नाम आबूरोड के स्टेशन के सामने वाली घनी आबादी क्षेत्र से सामने आ रहे हैं।
-शहर को ज्यादा तरजीह देने की
आबूरोड के चालीस वार्डों में से 21 वार्ड सामान्य श्रेणी के लिए हैं। ये आरक्षित नहीं हैं बल्कि ओपन हैं। इनमें से भी सात वार्ड महिलाओं के आरक्षित हैं। आबूरोड की नगर पालिका के अध्यक्ष का पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में 21 वार्डों और इनमें भी सात वार्डों को सबसे सुरक्षित माना जा रहा है। सामान्य महिला के लिए ओपन आरक्षित सीट हैं मतलब आबूरोड में सिर्फ सामान्य वर्ग की महिला ही नहीं ओबीसी, एससी और एसटी की महिला भी पालिकाध्यक्ष बन सकती है। यूं आम तौर पर राजनीतिक पार्टियां ऐसा करती नहीं हैं। लेकिन, इन संभावनाओ के चलते मिक्स पाॅपुलेशन वाले सामान्य श्रेणी की महिलाओं के अपने ही वार्ड से बाहर हो जाने की संभावनाएं भी रहेंगी।
आबूरोड में जो सात वार्ड सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षित हैं उनमें से सिर्फ तीन वार्ड शहर में स्टेशन के सामने वाले इलाके में हैं। शेष चार में से तीन वार्ड नदी पार और एक वार्ड पटरी के पार है। ऐसे में यदि इन वार्डों से पालिकाध्यक्ष बनता है तो इन बाहरी इलाकों की स्थिति और बेहतर होने की आशा यहां के लोगों को नजर आने लगी है। लेकिन, छोटा इलाका और नियमित संपर्क के कारण शहर के तीनों वार्डों में महिला उम्मीदवारों की ज्यादा संख्या रहने की संभावना है।
– इस डर से खुलकर नहीं आ रहे नाम
कांग्रेस हो या भाजपा। आबूरोड में सिरोही और पिण्डवाडा की तरह कोई प्रत्याशी खुलकर बाहर नहीं आ रहा है। इसके पीछे की एक वजह राज्य सरकार का चुनावों को लेकर रवैये को भी माना जा रहा है। लोगों की मानसिकता ये थी कि अभी चुनाव की घोषणा होने में ही एक पखवाडा और महीना लगेगा। लेकिन, चुनाव आयोग ने आज ही तिथि की घोषणा करके राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के कान पर बम फोड दिया। राजनीतिक पार्टियों की बेपरवाही का आलम ये है कि एक पार्टी के मुख्य पदाधिकारी के तो जयपुर में अधिकारियों के स्थानांतरण करवाने को घूमने की चर्चा यहां।
दूसरा डर है साख का। आबूरोड में इस पद पर दो प्रमुख जातियों को दावेदार माना जा रहा है। इनमें भी नगर पालिका चुनावों के खर्चीले होने के कारण एक ही वर्ग की इसमें जमकर लडने की संभावनाए जताई जा रही हैं। ऐसे में पहले से ही नाम सामने लाने और बाद में पार्टी से ही टिकिट नहीं मिलने से साख धूमिल होने का डर भी सता रहा है।


