आबूरोड के रिसॉर्ट ने मिटाया कांग्रेस-भाजपा का भेद!

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आबूरोड रिसॉर्ट पॉलिटिक्स।

सबगुरु न्यूज-आबूरोड। राजनीति में आमतौर पर रिसॉर्ट पॉलिटिक्स चुनावों के बाद होती है। इसमें कुर्सी पर एकाधिकार पाने का इक्छुक नेता अपनी पार्टी के जीते हुए पक्ष के जनप्रतिनिधि को साथ जाकर गोलबंदी करते हैं। आबूरोड में अलग नजारा बयां किया जा रहा है। यहां पर चुनाव में टिकिट वितरण से पहले की जा रही रिसॉर्ट पॉलिटिक्स की चर्चा है। इसे लेकर एक सप्ताह पहले आबूरोड के राजनीतिक सोशल मीडिया समूहों में हलचल मची हुई थी।

– अंतिम समय में बदला प्लान!

भाजपा और कांग्रेस के वार्ड प्रत्याशियों की चुनाव प्रभारियों और कोर कमेटी के सामने आवेदन और साक्षात्कार के पहले कथित रिसाॅर्ट में कांग्रेस के चार नेताओं को भाजपा में शामिल करवाने की चर्चा हुई। इनमें से तीन कांग्रेस के सिरोही के नेता के समर्थक और एक आबूरोड के उनके प्रतिद्वंद्वी के गुट के बताए जा रहे हैं। इनको इनके द्वारा वांछित वार्डों से चुनाव लडवाने के लिए भी चर्चा हो गई। आरोप ये लग रहा है कि इस चर्चा के बाद इनमें से कुछ लोग कांग्रेस की कोर कमेटी की टिकिट वितरण समिति के समक्ष भी टिकिट की कतार में लगे दिखे। सूत्रों के अनुसार इसी को लेकर जब भाजपा के सोशल मीडिया समूहों में कुछ लोगों ने आपत्ति जताई तो इन सबका सार्वजनिक रूप से दल बदलने का प्रोग्राम फेल हो गया।

-आधा दर्जन लोगों का तीसरा फ्रंट

आबूरोड में नगर पालिका के पालिकाध्यक्ष की सीट सामान्य महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में भाजपा से टीना अग्रवाल, डा भारती बंसल, भावना अग्रवाल जैसे नाम आगे हैं। ये सभी भाजपा के नेताओं के परिवार के हैं। वही कांग्रेस में संयम लोढा गुट से नगर अध्यक्ष नरगिस कायमखानी पालिकाध्यक्ष की दावेदार बताई जा रही हैं तो नीरज डांगी गुट से पूर्व नगर अध्यक्ष अमित जोशी के परिवार से कोई महिला। वहीं दोनों पार्टियों के सूत्रों की मानें तो इन सबके बीच एक रिसाॅर्ट में आधा दर्जन लोग एक अलग प्लानिंग पर काम करने में जुटे हुए हैं। इनमें दोनों राजनीतिक दलों के संगठन के पदाधिकारियों के अलावा आबूरोड नगर पालिका में कभी मुख्य पद पर रहे दो नेता, काॅलोनाइजर, नगर पालिका के ठेकेदार शामिल हैं। आबूरोड के बाहर के अन्य नेता भी थर्ड फ्रंट के एक्जीक्यूटीव मेंबर हैं।

 

सूत्रों की मानें तो इस समूह की कोशिश है कि दोनों पार्टियों से इनके आधा दर्जन केंडीडेट आ जाएं और कुछ निर्दलीय लडवा देवें तो इस स्थिति में इनकी मर्जी का पालिकाध्यक्ष नहीं बनने पर बार्गेनिंग कर सकें या सत्ता में बहुमत के साथ भागीदारी करके बोर्ड पर दबाव बना सकें। इस समूह के कई सदस्य तो दोनों पार्टियों के प्रमुख नेताओं के करीबी भी घोषित करते रहते हैं।

– क्या वायरल ऑडियो इसी रणनीति का हिस्सा!

कुछ दिनों पहले आबूरोड में एक ऑडियो वायरल हुआ था। इसमें एक शख्स ये दावा करता सुनाई दे रहा है कि वो कांग्रेस का समर्थक रहा है लेकिन, अभी परिस्थितियां ऐसी है कि भाजपा के साथ जाना पड रहा है। वो सामने वाले शख्स को इस बात के लिए कनविंस करता सुनाई दे रहा है कि वो उसके कांग्रेस का समर्थक होने की बात को ज्यादा प्रचार नहीं करे।

 

सूत्रों के अनुसार ये ऑडियो इसी थर्ड फ्रंट की एंट्री का हिस्सा है। जो शख्स कांग्रेस से भाजपा में जाकर टिकिट लेने का दावा कर रहा है वो आबूरोड की इसी रिसाॅर्ट पाॅलिटिक्स का ही हिस्सा बताया जा रहा है। यही नहीं एक संगठन के तो अनुसूचित जाति के प्रदेश स्तरीय नेता के अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित वार्डों में अपने लोगों को टिकिट दिलवाने का दबाव बनाने को भी इसी थर्ड फ्रंट का प्रयास का हिस्सा मान रहे हैं। सूत्रों के अनुसार इस समूह की मुख्य नजर कांग्रेस और भाजपा के ओबीसी, अगड़े, अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक बहुल वार्डों पर है।

 

नीरज डांगी और संयम लोढा गुट की गलाकाट प्रतिस्पर्धा के कारण आबूरोड में कांग्रेस का काबिज होना भगवान भरोसे है। वहीं भाजपा में भी पांव खिंचाई कम नहीं है। ऐसे में ये तीसरा फ्रंट अपने लिए मौके की तलाश में लग गया है। 31 अगस्त को ये पता चलेगा कि भाजपा और कांग्रेस में से कौन सबसे ज्यादा इस थर्ड फ्रंट के ट्रेप में फंसता है। यूं रणनीति यही बता रही है कि भाजपा और कांग्रेस के साथ इस थर्ड फ्रंट का ध्येय भी आबूरोड को राहत दिलवाने से जायदा खुदको पोषित करना नजर आ रहा है।