अजमेर। राजनीति भी अजीब चीज है। यहां कभी 37, 32 से बड़ा होता है और कभी 43, पूरे चुनाव का हिसाब-किताब ही बदल देता है। अजमेर नगर निगम के मेयर चुनाव ने सोमवार को कांग्रेस के लिए कुछ ऐसा ही सियासी गणित पेश किया। पार्षद चुनाव में 37 सीट जीतकर सबसे बड़ा दल बनने वाली कांग्रेस मेयर की कुर्सी से सिर्फ चार कदम दूर थी। लेकिन जब वोटिंग हुई तो ये चार कदम कुछ ज्यादा ही लंबे साबित हो गए।
कांग्रेस खेमे में सुबह तक जीत के दावे और उम्मीदों का माहौल था। आखिर 80 सदस्यीय सदन में उसके पास 37 पार्षद थे और बहुमत के लिए 41 का आंकड़ा चाहिए था। यानी चार वोटों की कमी थी। दूसरी ओर भाजपा के पास महज 32 पार्षद थे। गणित की किताब में तो कांग्रेस आगे दिखाई दे रही थी, लेकिन राजनीति की किताब में एक और अध्याय था—11 निर्दलीय पार्षद।
और यहीं से कहानी में ट्विस्ट आया।
मतगणना हुई तो भाजपा की अनामिका शर्मा के खाते में 43 वोट निकले, जबकि कांग्रेस की किरण गढ़वाल को 37 वोट मिले। यानी भाजपा ने अपने 32 पार्षदों से 11 वोट ज्यादा हासिल किए और छह वोट के अंतर से मेयर की कुर्सी अपने नाम कर ली।
अब कांग्रेस के लिए सवाल यह नहीं कि 37 कैसे आए, बल्कि सवाल यह है कि 37 के बाद 4 कहां गए? क्योंकि बहुमत के लिए जरूरी चार अतिरिक्त वोटों की तलाश में कांग्रेस को 11 निर्दलीयों में से पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका। इसके उलट भाजपा ने अपने संख्या बल से आगे जाकर 43 का आंकड़ा छू लिया।
मतलब साफ है—पार्षद चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने से मेयर की कुर्सी की चाबी अपने आप हाथ में नहीं आती। अजमेर में यह चाबी निर्दलीयों की जेब में थी और सोमवार को वह भाजपा के दरवाजे खुलवा गई।
कांग्रेस की 37 सीटों की खुशी मेयर चुनाव तक पहुंचते-पहुंचते फीकी पड़ गई और भाजपा की 32 सीटों की गिनती 43 तक पहुंच गई। राजनीति में इसे ही शायद कहते हैं—गणित वही रहता है, बस जोड़ने वाला बदल जाता है।
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