भाजपा हुई सक्रिय मैदान से गायब कांग्रेस

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सबगुरु न्यूज-सिरोही। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने प्रदेश में कांग्रेस को काडर की बजाय नेता बेस पार्टी बनाकर ग्रासरूट लेवल पर कांग्रेस को नगण्य कर दिया है। ऐसे में आचार संहिता लगने के बाद भी कई कई जिलों में कांग्रेस की कोई हलचल ही नहीं चल रही है।

ऐसे में वो किस तरह से सरकारी योजनाओं का प्रचार प्रसार करेगी और किस तरह से चुनाव लड़ेगी इसका कयास लगाना मुश्किल नहीं है। पूत के पांव पालने में नजर आ जाने के कारण ही राहुल गांधी भी पांच राज्यों में चार राज्यों में कांग्रेस के बेेहतर प्रदर्शन का दावा कर रहे हैं वहीं राजस्थान में कड़ा मुकाबले की बात कर रहे हैं।

सिरोही में भी अमूमन यही हाल है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सिरोही जिले में भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और संगठन को घास नहीं डाली और न ही उनकी बातों को तवज्जो दी। यहां तक की मुख्यमंत्री के सामने रखी हुई बातों को भी उन्होंने तवज्जो नहीं दी परिणाम स्वरूप जिले में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की गतिविधि बिल्कुल शून्य है।

यहां पर तीन नेता कांग्रेस को समाहित कर लिये हैं। इनमें सिरोही विधानसभा में निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा, रेवदर विधानसभा में कांग्रेस के प्रत्याशी नीरज डांगी और पिण्डवाड़ा आबू विधानसभा की शहरी क्षेत्र माउण्ट आबू में पूर्व उप सचेतक रतन देवासी। इन तीनों नेताओं पर ये आरोप लगता रहा है कि इन्होंने संगठन से जुड़े उन कार्यकर्ताओं को बिल्कुल तवज्जों नहीं दी जो इनकी बातों और दावों से नाइत्तेफाकी रखते हैं।  ऐसे में कांग्रेस का मतलब सिर्फ इनके समर्थक ही हो चुका है। जिलाध्यक्ष आनन्द जोशी ने तो अपने होर्डिंग्स से ही बता दिया था कि इन तीनों के आभार के भार से वो भारी हो गए हैं इसलिए जिला संगठन को अकेले अपने दम पर नहीं चला सकते।
इन तीनों नेताओं के अलावा जिले की तीनों विधानभाओं में कांग्रेस विचारधारा वाले लोगों का क्या हाल है ये जयपुर में राहुल गांधी के साथ बूथ अध्यक्षों की बैठकों में ही पता चल गया था। जिले के जो बूथ अध्यक्ष इन नेताओं के समर्थक थे वो अपने समर्थकों को जयपुर ले गए। जिनकी निष्ठा कांग्रेस के प्रति थी उनका आरोप था कि उन्हें जिलाध्यक्ष जिले में ही छोडक़र ट्रेन के अकेले जयपुर निकल गए। जिलाध्यक्ष की दलील थी कि इन्हें ले जाने की जवाबदेही संबंधित विधानसभा के दावेदारों की थी। अब जो जिलाध्यक्ष इस बात से अनभिज्ञ है कि कि क्या काम संगठन का है और क्या प्रत्याशी पद के दावेदारों का, उस संगठन की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
जिलाध्यक्ष के दावे पर यकीन करें तो वो अभी भी यही मानकर संगठन चला रहे हैं कि टिकिट मिलने के बाद संबंधित प्रत्याशी ही अपनी विधानसभा में कांग्रेस की नीतियों और योजनाओं को प्रचार प्रसार करेंगे। ऐसे में जिले में संगठन पूरी तरह से मृतप्राय पड़ा है। अब जो प्रत्याशी खड़ा होगा वो पंद्रह दिनों में फील्ड में जाकर कांग्रेस की योजनाओं का प्रचार प्रसार करके वोट मांगेगा। यदि वो लोगों को समझाने में सफल हो गया तो ठीक नहीं हुआ तो हारना तो है ही।

यूं इस बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कांग्रेस का जो हाल प्रदेश में किया है उससे पिछले चुनावों में कांग्रेस के लिए गली गली वोट मांगने के लिए गए थे वो इस बार तो जाने से रहे। क्योंकि आबूरोड हवाई पट्टी पर जो व्यवहार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कांग्रेस के निचले स्तर के जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियो के प्रति दिखाया है उससे वो कार्यकर्ता इस दावे के साथ तो जनता के बीच जाने से रहे कि कांग्रेस की सरकार आई तो हम आपका काम करवा देंगे। ऐसे में टिकिट मिलने के बाद कांग्रेस को नए कार्यकर्ताओं की भर्ती का अभियान भी तेज करना चाहिए, जिससे कि जीत सुनिश्चित कर सके।