एक साल में माउंट आबू ESZ में टनों चट्टानें निगल ली, कई पेड़ उखाड़े 

0
माउंट आबू में स्काउट राज्य स्तरीय ट्रेनिंग कैंप पास चट्टानें काटकर बनाया गया रास्ता।

माउंट आबू। माउंट आबू ईको सेंसेटिव जोन है। इसे ईको सेंसेटिव जोन बनाया गया था यहां के स्थानीय निवासियों की सहूलियत के लिए। इसके तहत उन्हें अपने जीवन स्तर के सुधार के लिए व्यावसायिक और रिहायशी भवनों की मरम्मत और निर्माण के लिए कई तरह की राहतें सुप्रीम कोर्ट और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा ईको सेंसेटिव जोन में दी गई हैं।

लेकिन, यहां के अधिकारियों ने इसी राहत को स्थानीय लोगों को आहत और बाहर से आकर जमीनें खरीदकर व्यवसायिक गतिविधिया संचालित करने वाले व्यापारियों और भू माफियाओं को राहत देने में इस्तेमाल किया। टॉयलेट शीट टूटने पर उसे बदलवाने व नए टॉयलेट बनवाने में उपखंड अधिकारी कार्यालय और नगर पालिका चक्कर लगा लगा कर स्थानीय लोगों की चप्पलें घिस जाती हैं । लेकिन, भ्रष्ट तरीके से यहां पर बड़े बड़े भवन जमीन से खड़े हो जा रहे हैं। यहां पर आसानी से टनों निर्माण सामग्री की तस्करी भी हो जा रही है और इको सेंसेटिव जोन के हर कायदे तोड़ने की पर आँखें मूंद ली जा रही है।

माउंट आबू में स्काउट ग्राउंड मुख्य द्वार पहले तोड़ दी गई बड़ी बड़ी चट्टानें और खोदी गई मिट्टी।

– एक साल में कई चट्टानें पेड़ किए गायब
माउंट नगर पालिका सीमा में ही भारत स्काउट गाइड का राज्य स्तरीय ट्रेनिंग सेंटर है। ट्रेनिंग सेंटर के मुख्य द्वारा से करीब 20 फीट पहले दाहिनी तरफ यानि उत्तर पश्चिम साइड में सिर्फ एक साल में ही कई सारी चट्टानें तोड़कर और पेड़ उखाड़ दिए गए हैं। माउंटेन मेन दशरथ मांझी की तरह यहां भी चट्टानों को काटकर रास्ता बना दिया गया है। इस जगह पर कोई भवन नहीं है ऐसे में ये चट्टानें और पेड़ अपने किसी परिजन को लाने ले जाने के लिए तबाह किए होंगे ऐसा प्रतीत नहीं होता।

स्थानीय सूत्रों की मानें तो यहां पर भवन निर्माण के लिए भूमि की समतल बनाया जा रहा है और उस भूमि तक पहुंचने के लिए कई पेड़ काट दिया और चट्टानों को काट दिया गया। ये काम जेसीबी से किए गया प्रतीत हो रहा है। इसकी आवाज भी आई होगी। लेकिन लग रहा है कि स्थानीय प्रशासन इससे आँखें मूंद हुए रहा।

माउंट आबू में स्काउट गाइड ग्राउंड पास की भूमि की 2024 को सेटेलाइट तस्वीरें में दिखते पेड़ और 2025 की सेटेलाइट तस्वीर में दिखती चट्टानें।

– सेटेलाइट तस्वीरें बता रही है हकीकत
इस जगह की सेटेलाइट तस्वीरें यहां के हालात बयां रही हैं। इन तस्वीरों के अनुसार ये काम एक साल भीतर ही हुआ है। 5 नवंबर 2018, 5 मार्च 2020, 12 मार्च 2024 तक यहां पर हरियाली दिख रही है। यानि ये इलाका पूरा का पूरा पेड़ों से घिरा था। 14 मार्च 2025 की तस्वीरों में यहां के सारे पेड गायब नजर आ रहे हैं। यानि इस बीच में इन पेड़ों को काट दिया गया था। इसकी जगह सिर्फ बड़ी- बड़ी चट्टानें नजर आ रही हैं। यही इसकी अंतिम सेटेलाइट इमेज है जो दिख रही है।
लेकिन, 9 फरवरी 2026 को ये चट्टानें भी इस जगह से गायब मिली। कई टन चट्टानों को तोड़कर और पेड़ों को काटकर इस जगह पर घाटी नुमा रास्ता बना दिया गया। सेटेलाइट इमेज में मौके की जो स्थिति दिख रही है, उसके अनुसार यहां पर कई टन चट्टानें थी। जितनी ऊंचाई और चौड़ाई इन चट्टानों की दिख रही है उतना मलबा यहां नहीं दिख रहा। इससे प्रतीत हो रहा है कि यहां से मलबा उठाकर वाहनों द्वारा दूसरी जगह ले जाया गया है। लेकिन फिर भी पेड़ चट्टानों के मलबे बता हैं कि यहां ईको सेंसेटिव जोन मूल कायदे को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है।

माउंट आबू ईको सेंसेटिव जोन में स्काउट ग्राउंड के पास की जमीन पर 2018 और 2020 की सेटेलाइट इमेजमें नजर आती हरियाली

– सरकारी जमीन या निजी?
चट्टानों पेड़ों को काटकर इस जगह पर ईको सेंसेटिव जोन के दो मूल प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है। वो ये कि न तो चट्टानें तोड़ी जाएंगी और न ही पेड़ काटे जाएंगे। यहां पर दोनों ही काम हुए हैं। जिला कलेक्टर यहां की मॉनिटरिंग कमिटी की सचिव हैं, जिस कमेटी जिम्मे इस सबको मॉनिटर करने की जवाबदेही है। ये एकदम खाली प्लॉट है। इसका ग्रेडिएंट 60 डिग्री से भी ज्यादा है। माउंट आबू में 20 डिग्री ग्रेडिएंट से ज्यादा की भूमि की के कन्वर्जन और निर्माण पर रोक है।

ऐसे में यदि ये निजी भूखंड है तो यहां तो निर्माण और इस तरह चट्टानों को तबाह करने की अनुमति मिल ही नहीं सकती। यदि ये सरकारी भूखंड है और इसके पेड़ काटकर वो चट्टानें साफ करके ये पीछे के किसी भवन तक जाने का रास्ता बनाया गया है तो ये सरकारी लापरवाही का और भी बड़ा उदाहरण है। ऐसे में रिवेन्यू चोरी के इस मामले में माइनिंग विभाग को भी सूचना दिया जाना जरूरी हो जाता है।