
आबूरोड। यूआईटी ने आरटीआई का जो जवाब दिया है उससे तो ये ही संदेश जा रहा है कि जिले के दो प्रमुख आईएसएस अधिकारियों के संरक्षण वाली इस संस्थान से अधिकारियों की नाक के नीचे से पास हुई कॉलोनियो के नक्शे गायब हो रहे हैं। अब नक्शे गायब हुए हैं या जानबूझ कर छिपाए जा रहे हैं।
इनको छिपाने के पीछे आबूरोड में रियल स्टेट के धंधे से जुड़े लोगों की यूआईटी की सांठगांठ है या रियल स्टेट के इन्वेस्टर और एक अदद मकान के लिए जीवन की सारी पूंजी डालने वाले मध्य वर्ग की आंख में धूल झोंक कर उनकी कमाई को बर्बाद करने की कोशिश। ये जिला कलेक्टर और माउंट आबू उपखंड अधिकारी खुद जांच करें तो जानकारी सामने आए। लेकिन, यूआईटी आबूरोड के नगर नियोजक के द्वारा आरटीआई में दी गई सूचना राज्य सरकार की नियोजित शहरी विकास की गारंटी देने वाली संस्था की साख पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।
– नक्शे तो तैयार होते हैं फिर तैयारी की क्या जरूरत?
सूचना के अधिकार के तहत जो सूचना मांगी गई थी उसमें कॉलोनियों के नक्शे हैं। उन कॉलोनियों के नक्शे एक तैयार दस्तावेज है। इन्हीं की सत्य प्रतिलीपि मांगी गई थी। सूचना के अधिकार के तहत तीन तरह की सूचना नहीं दी जा सकती। एक जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हो। दूसरी जो किसी व्यक्ति की निजी सूचना हो। तीसरी जो तैयार फॉर्मेट में नहीं हो और तैयार करनी पड़े।
कॉलोनी के नक्शे क्योंकि किसी आम आदमी इन्वेस्टमेंट से जुड़ा मसला है। इसकी जानकारी मिलने पर ही व्यक्ति जायज डॉक्यूमेंट के आधार पर अपना इन्वेस्टमेंट सकता है जिससे किसी लीगल इश्यू के कारण उसका इनवेस्टमेंट फंस नहीं जाए। सरकार भी किसी जमीन को खरीदने से पहले टाउन प्लानिंग, स्थानीय निकाय, रजिस्ट्रार ऑफिस आदि से इसके स्टेटस की जानकारी जुटाने के जागरूकता फैलाती रहती है। ऐसे में सुरक्षा कारणों और निजी सूचना होने के बहाने इस सूचना को रोका नहीं जा सकता था।
तो सूचना मांगे गए फॉर्मेट में तैयार नहीं होने और उसे तैयार करने में अतिरिक्त खर्च लगने के तीसरे नियम को अपनाया गया। इसी ने पूरी यूआईटी की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया। क्योंकि कॉलोनी के नक्शे पास हुए बिना यूआईटी पट्टे जारी नहीं कर सकती। उसी के आधार पर पट्टे रजिस्ट्री होती है। सूचना के अधिकार के तहत कॉलोनी के नक्शे की ही सत्य प्रतिलिपि मांगी गई थी। नक्शे अपने मूल फॉर्मेट मं ही तैयार रहता हैं इनको तैयार करने की जरूरत नहीं है। इसके बाद भी इसे सूचना को तैयार करने वाली श्रेणी में डाला।
– मूल आवेदन पढ़े बिना तो नहीं कर दिए हस्ताक्षर !
यूआईटी से मूल दस्तावेजों की सत्य प्रतिलिपि मांगी गई थी। जिसके लिए नगर नियोजक ने ये जवाब दिया कि ये कंपाइल्ड फॉर्म में नहीं हैं, इसे तैयार के में अतिरिक्त मेहनत करनी होगी। यूआईटी के नगर नियोजक के हस्ताक्षर से जारी सूचना के अधिकार के पत्र से दो ही संभावनाएं हो सकती हैं। एक तो ये कि उन्होंने सूचनाएं मूल रूप में तैयार नहीं होने की टिप्पणी पर हस्ताक्षर करने से पहले मूल आवेदन को पढ़ा नहीं है।
संबंधित विभाग के द्वारा जवाब तैयार करके उनके समक्ष प्रस्तुत किया गया होगा और उन्होंने विश्वास में हस्ताक्षर कर दिए होंगे। यदि मूल आवेदन पढ़कर ये जवाब दिया है तो फिर यूआईटी के अध्यक्ष और सचिव दोनों को इस पूरी व्यवस्था की जांच करवानी चाहिए कि कहीं बिना पास हुई कॉलोनियों या फिर कॉलोनी के पास हुए फॉर्मेट के विपरीत पट्टे तो नहीं जारी कर दिए गए हैं या फिर ये कि नक्शा कुछ दूसरा पास किया हो और मौके बेचे किसी और प्लान से जा रहे हों। क्योंकि आबूरोड यूआईटी से पास ऐसी भी कॉलोनी मिली है जिसके रिवेन्यू और सेटेलाइट व मौके की स्थिति में साफ अंतर दिखाई दे रहा है। ये अंतर ऐसा है जो भविष्य में निवेशक को असुविधा में डाल सकता है।


