अजमेर। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने देश की पर्यावरणीय और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण भाषायी सुझाव के साथ केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से ‘Indian Forest Department’ के स्थान पर ‘Bharatiya Aranya Vibhag’ यानी ‘भारतीय अरण्य विभाग’ नाम अपनाने पर विचार करने का आग्रह किया है।
प्रो. अग्रवाल ने मंत्रालय के सचिव तन्मय कुमार को भेजे पत्र में कहा कि ‘Forest’ शब्द वन क्षेत्र और प्रशासनिक व्यवस्था को परिभाषित करने के लिहाज से उपयुक्त है, लेकिन भारतीय संदर्भ में ‘अरण्य’ शब्द का अर्थ कहीं अधिक व्यापक और गहरा है। भारतीय ज्ञान परंपरा में अरण्य केवल पेड़-पौधों से घिरा क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि अध्ययन, चिंतन, साधना, सह-अस्तित्व और प्रकृति के साथ सामंजस्य का केंद्र भी रहा है।
भारतीय परंपरा में अरण्य की विशेष भूमिका
कुलगुरु ने अपने पत्र में भारतीय सभ्यता में अरण्य की प्राचीन अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि आरण्यक ग्रंथों, ऋषियों के वन आश्रमों और वनवास की परंपरा में प्रकृति के प्रति भारतीय दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है। वृक्षों, नदियों, पशु-पक्षियों और समूचे जीव-जगत के प्रति सम्मान इस दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। उनके अनुसार भारतीय परंपरा में प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच धर्म, कर्तव्य तथा पारस्परिक उत्तरदायित्व का संबंध माना गया है।
पर्यावरण संरक्षण के साथ संस्कृति का भी संदेश
प्रो. अग्रवाल का कहना है कि ‘भारतीय अरण्य विभाग’ नाम पर्यावरण संरक्षण, पारिस्थितिकी, नैतिकता और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को एक साथ अभिव्यक्त करने में सक्षम हो सकता है। यह नाम भारतीय ज्ञान प्रणालियों और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की व्यापक अवधारणा से भी जुड़ता है, जिसमें प्रकृति को समूचे जीवन की साझा विरासत के रूप में देखने की भावना निहित है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका सुझाव महज प्रशासनिक नाम बदलने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे यह विचार है कि देश की आधिकारिक शब्दावली में भारतीय सभ्यता की पारंपरिक पर्यावरणीय समझ को भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए।
विशेषज्ञों के बीच व्यापक विमर्श की मांग
कुलगुरु ने कहा कि भारत आज आधुनिक पर्यावरण विज्ञान को अपनी पारंपरिक और स्वदेशी पारिस्थितिक समझ के साथ जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में ‘अरण्य’ जैसी भारतीय अवधारणा इस समन्वय को अधिक प्रभावी और अर्थपूर्ण तरीके से सामने रख सकती है।
उन्होंने मंत्रालय से आग्रह किया कि इस प्रस्ताव को पर्यावरणविदों, वन विभाग के अधिकारियों, शिक्षाविदों, भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेषज्ञों और अन्य संबंधित पक्षों के बीच व्यापक चर्चा का विषय बनाया जाए।
प्रो. अग्रवाल के मुताबिक ‘अरण्य’ शब्द भारतीय पर्यावरणीय स्मृति और सभ्यतागत चेतना को अपने भीतर समेटे हुए है। ऐसे में ‘भारतीय अरण्य विभाग’ नाम आधुनिक वन संरक्षण व्यवस्था और भारत के पारंपरिक प्रकृति-दर्शन के बीच एक वैचारिक सेतु का काम कर सकता है।



