
परीक्षित मिश्रा
सिरोही। पिछले दस सालों में राजनीति में काम बढ़ा हो या नहीं बढ़ा हो जनप्रतिनिधियों की आत्ममुग्धता जरूर बढ़ी है। राजशाही में ये आत्ममुग्ध राजा के महिमामंडन के लिए विशेष दरबान रखे हुए होते थे। लोकतंत्र में ये काम करने के लिए ये काम पार्टियों की आईटी सेल रखी हुई है। इसी तरह की आत्ममुग्धता में जालौर-सिरोही के सांसद को उनके कारिंदे किसान केसरी का स्वयंभू तमगा देकर हवा भरते रह गए और उधर गुजरात जालोर और सिरोही के किसानों की शान और पहचान को ले उड़ा। इसे लेकर जालोर सिरोही के सांसद की कोई आपत्ति या आश्वासन सामने नहीं आया।यही नहीं किसानी से जुड़े होने का बावजूद ढाई साल में उन्होंने क्षेत्र की विशिष्ट फसलों को लेकर किसानों के आर्थिक फायदे के लिए जीआई (global indication) टैग के लिए इनिशिएटिव लेने का कोई प्रेस नोट जारी नहीं किया। ये बात अलग है कि निरन्तर पुराने सांसदों और विधायकों के इनिशिएटिव के चरणबद्ध प्रयासों का अब आउटपुट आने पर फोटो और उपलब्धि दोनों ओढ़ने में कसर नहीं रखी।
– जीरे और सौंफ का जीआई टैग ऊंझा के पास
आबू फेनल सौंफ की उस प्रजाति का नाम है जो दुनिया में अपनी बेहतरीन खुशबू, मिठास और रस के लिए जानी जाती है। राजस्थान के सिरोही-जालोर के बॉर्डर जिलों में होती है। यहां इसका उत्पादन बहुतायत में होता है। यही स्थिति जीरे की भी है। लेकिन, स्थानीय नेताओं के नकारेपन के कारण इस प्रोडक्ट को बेचने के लिए राजस्थान में मंडी की स्थापना नहीं की जा सकी। मजबूरन सौंफ और जीरे के किसानों को अपनी फसल को बेचने के लिए राजस्थान के सिरोही के बोर्डर से करीब 70-80 किलोमीटर दूर गुजरात के ऊंझा में जाना पड़ता है। ऊंझा जीरे और सौंफ की भारत की प्रमुख मंडियों में शामिल हो गया। यहां जीरे और सौंफ की पैकेजिंग तथा मार्केटिंग का प्रमुख उद्योग विकसित हो गया। अब उसने जीरे और सौंफ का जीआई टैग ले लिया है। इससे वहां के किसानों को यही दो फसलें उगाने वाले राजस्थान के सीमावर्ती सिरोही और जालोर जिले के किसानों से ज्यादा आर्थिक फायदा होगा।
– क्या है जीआई टैग
जीआई टैग यानि ग्लोबल इंडिकेशन यानि भौगोलिक संकेत टैग किसी भी क्षेत्र के विशिष्ट उत्पाद को इस गारंटी के लिये मिलता है कि ये उत्पाद खास जगह की विशिष्ट खासियत को लिए हुए है। भारत में सबसे पहले जीआई टैग दार्जलिंग चाय को मिला था। जीआई टैग मिलना किसी भी उत्पाद के लिए अंतर्राष्ट्रीय गारंटी होता है कि ये प्रोडक्ट उसी जगह और गुणवत्ता का है जिसका कि उल्लेख टैग के आवेदन के दौरान किया गया है। जीआई टैग मिलने के बाद उस प्रोडक्ट के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार खुल जाता है। इससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलता है।
– जीरे में आज भी राजस्थान अव्वल
ऊंझा ने सौंफ और जीरे का जीआई टैग लिया है। स्पाइसेज इंडिया की वेबसाइट पर कृषि मंत्रालयों से जुटाई गई सूचनाओं के अनुसार राजस्थान 2024-2025 में भी जीरे की खेती से उत्पादन के मामले में देश में अव्वल रहा है। 2024-25 में गुजरात में चार लाख 76 हजार 557 हेक्टेयर भूमि पर जीरे की खेती की गई थी और राजस्थान में 10 लाख 81 हजार 550 में। गुजरात में उत्पादन 4 लाख 71 हजार 838 टन है था तो राजस्थान में 6 लाख 88 हजार 560 टन। वही सौंफ की बात करें तो गुजरात में इस साल 63 हजार 776 हेक्टेयर में और राजस्थान में 38 हजार 490 हेक्टेयर भूमि पर बुआई हुई। वहीं क्रमशः एक लाख 31 हजार 129 टन उत्पादन गुजरात में हुआ और 44 हजार 94 टन राजस्थान में।
– आबू फेनल सर्वोत्कृष्ट?
जीरे का उत्पादन राजस्थान में सबसे ज्यादा होता है और सौंफ का गुजरात में। राजस्थान में भी सौंफ का उत्पादन नागौर में ज्यादा होता है। लेकिन, गुजरात और नागौर की सौंफ उस गुणवत्ता के लिए नहीं जानी जाती जिसके लिए आबू फेनल जानी जाती है। ये सौंफ रंग के मामले में हल्की भूरी हरी होती है और कम एसेंशियल ऑयल होता है। जीरे के जीआई टैग के मामले में हम लोग पिछड़ गए वहीं सौंफ का भले ही उत्पादन कम हो रहा हो लेकिन, सिरोही जिले को माउंट आबू की तराई में बोई जाने वाली सौंफ को विशिष्ट प्रजाति आबू फेनल विश्व में उच्च गुणवत्ता की मानी जाती है। इसके गहरे हरे रंग और 2.5% एसेंशियल ऑयल के कारण ये स्वाद, गुणवत्ता और पोषण तीनों लिहाज से उच्च है। खुशबू और एसेंशियल ऑयल ही वो प्रमुख खासियत है जिस पर एरोमा थेरेपी टिकी हुई है। सौंफ के मामले में ये खासियत सिर्फ आबू फेनल में है। आबू फेनल की सौ के करीब प्रजातियां पेटेंटेड हैं।
– रिसर्च रिपोर्ट के कई तथ्यों को चुनौती
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जोधपुर स्थित दक्षिण एशिया जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (एसएबीसी) ने इस संबंध में पुनर्विचार की मांग की है। उनका दावा है कि ऊंझा को जीरे और सौंफ दोनों का जीआई टैग एक ही दिन में मिला है। सौंफ की कंटेंट रिपोर्ट में अन्य सौंफ के साथ इसकी तुलनात्मक रिपोर्ट नहीं प्रस्तुत की गई है। इसे जीआई टैग देने के लिए जो गुण बताया गया है वो इसकी खुशबू है। लेकिन, इसके संबंध में भी कोई तुलनात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई।
दरअसल ऊंझा में सिरोही जिले की सौंफ का 90% उत्पादन मंडी में बिकने जाता है। दावा ये किया जाता था है कि खुशबू और स्वाद के लिए ऊंझा में जिस प्रीमियम प्रोडक्ट पैकेजिंग होती है वो आबू फेनल ही होती है। ऐसे में कृषि विशेषज्ञ ये मान रहे हैं कि यदि उन्होंने आबू फेनल को ही खुशबू और स्वाद के लिए अधिकृत करवाकर जीआई टैग लिया है तो ये सिरोही-जालोर के किसानों के साथ कुठाराघात होगा।
सिरोही- जालौर के सांसद अपने करीबियों से खुदको किसान केसरी संबोधित करवाना पसंद करते हैं। वो जिले के प्रगति शील किसानो में शामिल होकर वसुंधरा राजे के 2003-08 के कार्यकाल में प्रगतिशील किसान के रूप में इजरायल भी जाकर आए थे। प्रगतिशील किसान होने के बावजूद भी सांसद रहते हुए अपने ही क्षेत्र के कृषि उत्पाद को जीआई टैग दिलवा के किसानों का हक और फायदा दिल्ली से नहीं दिलवा पाए। ऊंझा की सौंफ और जीरे को जीआई टैग मिलने और हाईकोर्ट के द्वारा आदर्श सोसायटी के निवेशकों के लिए समिति गठित करने की घटना आसपास की ही हैं। लेकिन, सांसद आदर्श के मुद्दे को तो संसद में बोले दिए लेकिन सौंफ और जीरे के जीआई टैगको लेकर उठ रहे सवालों पर संसद में दो शब्द नहीं बोले।


