छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण पर नए नियम लागू, पूर्व सूचना अनिवार्य; अवैध धर्म परिवर्तन पर कड़ी सजा का प्रावधान

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रायपुर। छत्तीसगढ़ में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को विनियमित करने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम-2026 के तहत विस्तृत नियम लागू कर दिए हैं। राजपत्र में बीते 4 अगस्त को अधिसूचना प्रकाशित होने के साथ ही यह कानून पूरे प्रदेश में प्रभावी हो गया है।

सरकार ने इसके क्रियान्वयन के लिए चार भागों और 24 धाराओं वाली नियमावली जारी की है, जिसमें धर्म परिवर्तन की पूर्व सूचना, जांच प्रक्रिया, प्रशासनिक जिम्मेदारियां, विशेष अदालतों में सुनवाई तथा अवैध धर्मांतरण पर दंडात्मक कार्रवाई का विस्तृत प्रावधान किया गया है।

नियमों के अनुसार धर्म परिवर्तन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को प्रस्तावित तिथि से कम से कम 90 दिन पहले निर्धारित प्रारूप में जिला कलेक्टर को लिखित घोषणा देनी होगी। प्रशासन इस घोषणा के आधार पर आवश्यक जांच और अन्य औपचारिकताएं पूरी करेगा।

वहीं मूल या पैतृक धर्म में वापसी (घर वापसी) के मामलों में संबंधित व्यक्ति से आवश्यक जानकारी प्राप्त होने के बाद 15 दिनों के भीतर जांच पूरी करने का प्रावधान किया गया है। ऐसे मामलों में किसी तीसरे पक्ष की सहमति आवश्यक नहीं होगी। प्रत्येक धर्म परिवर्तन का ऑनलाइन रिकॉर्ड भी रखा जाएगा।

अंतर-धार्मिक विवाह अथवा विवाह के उद्देश्य से किए जाने वाले धर्म परिवर्तन के लिए भी अलग प्रक्रिया निर्धारित की गई है। यदि विवाह में धर्म परिवर्तन शामिल है, तो प्रस्तावित विवाह से कम से कम 60 दिन पहले जिला कलेक्टर को सूचना देना अनिवार्य होगा।

प्रशासन इस सूचना को ऑनलाइन पोर्टल तथा नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक करेगा, जिस पर 30 दिनों के भीतर आपत्तियां दर्ज कराई जा सकेंगी। निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना धर्म परिवर्तन कर विवाह किए जाने पर उसे कानून के दायरे में अपराध माना जाएगा। कानून में केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से की गई शादी को शून्य घोषित किए जाने का भी प्रावधान किया गया है।

जनजातीय क्षेत्रों में धर्मांतरण से जुड़े मामलों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। बस्तर और सरगुजा संभाग में यदि बल, प्रलोभन या धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन की शिकायत मिलती है, तो जांच के दौरान ग्राम सभा की राय को महत्व दिया जाएगा। ग्राम सभा की रिपोर्ट के आधार पर प्रशासनिक और पुलिस नोडल अधिकारी आवश्यक कार्रवाई करेंगे।

धर्म परिवर्तन कराने वाले धर्मगुरुओं और संबंधित आयोजकों तथा संस्थाओं के लिए भी नए प्रावधान लागू किए गए हैं। धर्मांतरण से जुड़े आयोजन करने वाली संस्थाओं को कम से कम 30 दिन पहले पंजीकरण कराना होगा। यह पंजीकरण पांच वर्ष तक वैध रहेगा। इनके विदेशी एवं घरेलू वित्तीय लेनदेन पर भी प्रशासन की निगरानी रहेगी।

नियमों में अवैध धर्मांतरण के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। सामान्य अवैध धर्मांतरण पर 7 से 10 वर्ष तक कारावास तथा न्यूनतम 5 लाख रुपए जुर्माना निर्धारित किया गया है। महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा नाबालिग के धर्मांतरण पर 10 से 20 वर्ष तक कारावास और न्यूनतम 10 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है।

सामूहिक अवैध धर्मांतरण के मामलों में 10 वर्ष से आजीवन कारावास तथा 25 लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकेगा। लोक सेवक द्वारा अवैध धर्मांतरण कराने पर 10 से 20 वर्ष तक कारावास और 10 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। धन के लिए धर्मांतरण कराने पर 10 से 20 वर्ष तक कारावास तथा 20 लाख रुपए तक जुर्माना, जबकि भय अथवा प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने पर 10 से 20 वर्ष तक कारावास और न्यूनतम 30 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

विधेयक के तहत प्रत्येक जिले में विशेष अदालत गठित की जाएगी, जहां ऐसे मामलों की सुनवाई होगी। सरकार का लक्ष्य है कि इन मामलों का निपटारा छह महीने के भीतर किया जाए।

उपमुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री विजय शर्मा ने आज कहा कि 4 अगस्त को अधिनियम के नियमों की अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित हो चुकी है। इसके साथ ही कानून पूरे प्रदेश में प्रभावी हो गया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना और अवैध धर्मांतरण पर प्रभावी रोक लगाना है।

उन्होंने कहा कि अब जो लोग अवैध धर्म परिवर्तन कराने या इसके लिए काम करने में शामिल होंगे, उनके खिलाफ कानून के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि 24 धाराओं वाले इस कानून में क्रियान्वयन की पूरी व्यवस्था तय कर दी गई है। प्रशासनिक अधिकारियों को भी नियमों के अनुरूप कार्रवाई करने के निर्देश दिए जाएंगे।

राज्य सरकार का कहना है कि कानून का उद्देश्य विधिसम्मत प्रक्रिया सुनिश्चित करना, अवैध धर्मांतरण की रोकथाम, प्रभावी निगरानी तथा प्रशासनिक जवाबदेही तय करना है।

गौरतलब है कि राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्रों, विशेषकर बस्तर, जशपुर और रायगढ़ में धर्मांतरण को लेकर लंबे समय से विवाद सामने आते रहे हैं। नारायणपुर क्षेत्र में इसे लेकर सामाजिक तनाव और टकराव की घटनाएं भी हुई हैं। राज्य सरकार का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था लागू की गई है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ में लगभग 727 चर्च हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे चर्चों को शामिल करने पर इनकी संख्या 900 से अधिक बताई जाती है। राज्य का सबसे पुराना चर्च विश्रामपुर स्थित सिटी ऑफ रेस्ट है, जिसका निर्माण वर्ष 1868 में हुआ था।

वहीं जशपुर जिले के कुनकुरी में वर्ष 1979 में स्थापित एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रोमन कैथोलिक कैथेड्रल चर्च स्थित है, जहां विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रार्थना के लिए पहुंचते हैं और समय-समय पर धर्म प्रचार से जुड़े कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।