बेंगलूरू/नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को कर्नाटक के मांड्या में श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर के भव्य मंदिर का उद्घाटन किया और भारत के सामाजिक सांस्कृतिक और सभ्यतागत उत्थान में मंदिर-मठ और आध्यात्मिक परम्पराओं के योगदान का उल्लेख करते हुए जनता से जल संरक्षण, वृक्षाराेपण और प्राकृतिक खेती जैसे कार्यों के प्रोत्साहन के लिए नौ संकल्प कराए।
मोदी ने श्री आदि चुंचनगिरी महासंस्थान मठ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि हमारे समाज में समय समय पर ऐसे महान व्यक्तित्व आते रहे हैं, जो केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन तक सीमित नहीं रहे। वे लोगों के बीच रहे, उन्होंने लोगों के सुख-दुख को समझा, उनके संघर्ष को महसूस किया, और समाज को दुख से, पीड़ा से, कठिनाई से बाहर निकालने का रास्ता दिखाया।
कार्यक्रम में मठ के वर्तमान प्रमुख जगतगुरू डॉ निर्मलानंदनाथ महास्वामी, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, कर्नाटक के राज्यपाल थावर चंद गहलोत, स्वामी परमात्मानंद सरस्वती, केंद्र में मंत्री एचडी कुमार स्वामी, शोभा करंदलाजे, कर्नाटक विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष आर अशोका, राज्य के मंत्री एन चेलुवराय स्वामी तथा मठ से जुड़े संत और श्रद्धालु उपस्थित थे।
प्रधानमंत्री ने कहा कि श्री आदि चुंचनगिरी महासंस्थान मठ, अन्न, अक्षर, आरोग्य, अध्यात्म, आश्रय, अरण्य, आकलु, अनुकंपा और अनुबंध, इन नौ सिद्धांतों पर कार्य करता है। मोदी ने इसी भावना से लोगों को नित्य जीवन में नौ क्षेत्रों से संबंधित नौ संकल्प के साथ काम करने के आह्वान किया। इनमें पानी बचाने, पेड़ लगाने, स्वच्छता, स्वदेशी, घरेलू पर्यटन को प्राथमिकता, रसायन मुक्त खेती, भोजन पान में श्री अन्न को प्रमुखता तथा खाद्य तेल के सेवन में 10 प्रतिशत की कटौती, खेल-कूद तंदरुस्ती पर ध्यान तथा सेवा भाव का संकल्प शामिल है।
मोदी ने इन संकल्पों के लिए आह्वान करते हुए कहा कि मैं आप सभी के सामने नौ ऐसे क्षेत्र रखना चाहता हूं, जहां हम सभी मिलकर एक सामूहिक संकल्प ले सकते हैं। मैं अपने नौ आग्रह आपके सामने रखता हूं। कर्नाटक को तत्वज्ञान और तंत्रज्ञान से समृद्ध भूमि बताते हुए मोदी ने कहा कि यहां दर्शन की गहराई और टेक्नोलॉजी की शक्ति, दोनों मौजूद हैं। श्री आदि चुंचनगिरी महासंस्थान मठ जैसे आध्यात्मिक केंद्र इस महान भूमि की महान देन हैं। ये संस्था तत्वज्ञान, आध्यात्मिकता और नैतिक मूल्यों के माध्यम से समाज को दिशा देती है। उन्होंने कहा कि भारत हजारों वर्षों से चलती आ रही एक जीवंत सभ्यता है। दुनिया में बहुत कम ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां परंपराएं इतनी लंबी अवधि तक निरंतर बनती रहती हैं।
उन्होंने कहा कि हम श्री आदि चुंचनगिरी महासंस्थान मठ को देखते हैं, तो हमें इस निरंतरता का साक्षात रूप दिखाई देता है। इस पवित्र मठ का इतिहास लगभग दो हजार वर्षों का है। इसकी गुरु परंपरा, इसका आध्यात्मिक दर्शन, और इसकी सेवा की परंपरा ने पीढ़ियों तक इस भूमि को समृद्ध किया है।
उन्होंने इस मठ की जीवंत समृद्ध परंपरा का उल्लेख् किया। इसी परंपरा में जगद्गुरु श्रीश्रीश्री डॉ. बालगंगाधरनाथ महास्वामीजी जैसे महान संत हुए, जिन्होंने इस विरासत को नई ऊंचाई दी। आज जगद्गुरु श्रीश्रीश्री डॉ. निर्मलानंदनाथ महास्वामीजी उसी धारा को नई ऊर्जा और गति और समर्पण के साथ सबको साथ लेकर के आगे बढ़ा रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जगद्गुरु श्रीश्रीश्री डॉ. बालगंगाधरनाथ महास्वामीजी में गहरी आध्यात्मिक शक्ति थी, लेकिन उनका जीवन केवल साधना तक सीमित नहीं था। गांव की पृष्ठभूमि से आने के कारण वे ग्रामीण युवाओं की आकांक्षाओं और जन सामान्य की चुनौतियों को समझते थे। इसलिए, उनके लिए भक्ति का अर्थ समाज से दूर जाना नहीं, बल्कि समाज के लिए आगे बढ़कर जिम्मेदारी उठाना था।
उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सैकड़ों संस्थान स्थापित किए, जहां प्राइमरी लेवल से लेकर मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्स तक की शिक्षा दी जा रही है। इसका लाभ सबसे ज्यादा गरीब और ग्रामीण परिवारों से आने वाले बच्चों को मिला है। उन्होंने स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐसे स्वास्थ्य सेवा संस्थान बनाये जो आज भी सेवाभाव से काम कर रहे है।
प्रधानमंत्री ने आयुष्मान भारत योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी सरकार भी इसी विजन के साथ काम कर रही है। मोदी ने कहा कि महास्वामीजी करुणा की प्रतिमूर्ति थे। मोरों की रक्षा के लिए उन्होंने जो सामाजिक आंदोलन खड़ा किया, वो इसका उदाहरण है। प्रधानमंत्री ने अपने सरकारी आवास में बड़ी संख्या में मोरों के बसेरे का उल्लेख करते हुए कहा कि उनमें से कई मोरों के साथ उनकी अच्छी दोस्ती भी हो गई है। उन्होंने कहा कि मैं तो प्रत्यक्ष देखता हूं कि मोर कितना शांत और सुंदर पक्षी है।
उन्होंने मठ की परम्परा को आगे बढ़ाने और लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के उनके प्रसायों के लिए साधुवाद व्यक्त करते हुए कहा कि अपने गुरु के सम्मान में निर्मलानंदनाथ महास्वामीजी द्वारा श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर का निर्माण करना केवल एक संरचना बनाना नहीं है, ये एक भाव को साकार करना है। आने वाले समय में यह स्थान निश्चित रूप से सेवा, साधना और प्रेरणा का केंद्र बनेगा।



