जयपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को लेकर एक अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की पीठ ने राज्य सरकार की ट्रांसजेंडर नीति को सिर्फ दिखावा करार देते हुए ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों को नौकरी और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में तीन प्रतिशत अतिरिक्त वेटेज देने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश एक जनहित याचिका पर मंगलवार को सुनाया गया।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य की मौजूदा नीतियां ट्रांसजेंडर समुदाय को वास्तविक लाभ नहीं दे पा रही हैं और उन्हें शिक्षा एवं रोजगार में बराबरी का अवसर नहीं मिल रहा।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल कागजी नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है। ट्रांसजेंडर समुदाय को मुख्यधारा में लाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाना जरूरी है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि लैंगिक पहचान व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसे किसी प्रशासनिक प्रक्रिया से सीमित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह ट्रांसजेंडर समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का व्यापक अध्ययन करके एक समग्र नीति तैयार करे। इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने और समयबद्ध सिफारिशें देने को भी कहा गया है।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुरूप सभी वर्गों को समान अवसर मिलना चाहिए और ट्रांसजेंडर समुदाय को केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक लाभ सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। यह निर्णय ट्रांसजेंडर अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।



