राजस्थान पीसीसी अध्यक्ष और सिरोही जिलाध्यक्ष ने राहुल गांधी के दावों की निकाली हवा! 

0
सिरोही कांग्रेस फाइल फोटो

सबगुरु न्यूज-सिरोही। जातिगत जनगणना को लेकर राहुल गांधी के जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी का स्लोगन है। राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और सिरोही के जिलाध्यक्ष लीलाराम गरासिया ने जिला कांग्रेस की कार्यकारिणी में राहुल गांधी के इस स्लोगन की हवा निकाल दी है। हाल में घोषित हुई जिला कांग्रेस की 31 सदस्यों की कार्यकारिणी से तो ऐसा ही लगता है। इस कार्यकारिणी में जिले की ही कई ऐसी वंचित जातियों कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया है जो कांग्रेस की मूल वोट बैंक मानी जाती हैं। यही नहीं राहुल गांधी भले ही ओबीसी को अधिकार दिलवाने का दावा करते रहे हों लेकिन, सिरोही जी की कार्यकारिणी में ओबीसी के कई वर्गों को पूरी तरह से दरकिनार कर देने का आरोप लग रहा है।

कांग्रेस जिलाध्यक्ष लीलाराम गरासिया की भेजी कार्यकारिणी को गोविंद सिंह डोटासरा ने पारित किया। इस बार कांग्रेस ने संगठन स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किया है। संगठन सूत्रों के अनुसार तीन और तीन से कम विधानसभा वाले जिलों में जिला कार्यकारिणी की संख्या 32 तक सीमित कर दी गई है। इसी तरह से तीन और तीन से ज्यादा विधानसभा वाले जिलों में संगठन की कार्य करिणी की संख्या 52 कर दी गई है। इसमें भी हर विधानसभा की कुछ कैपिंग लागू की हैं।

इनके अनुसार प्रत्येक जिले की विधानसभा के विधायक और विधानसभा प्रत्याशियों तथा जिलाध्यक्ष के द्वारा दिए गए नामों की संख्या दस से ज्यादा नहीं होगी। ऐसे में किसी भी गुट के दस से ज्यादा पदाधिकारी जिला कार्यकारिणी में नहीं हो सकते। सिरोही जिले संयम लोढ़ा और लीलाराम गरासिया पिछले विधानसभा चुनावों में क्रमशः सिरोही और पिंडवाड़ा आबू विधानसभा से कांग्रेस के प्रत्याशी थे। लीलाराम गरासिया विधानसभा प्रत्याशी के साथ साथ जिलाध्यक्ष भी हैं। रेवदर विधानसभा में कांग्रेस विधायक मोतीराम कोली हैं दस सदस्य इनके कोटे में थे। ऐसे में चार लोगों में 31 पदों वितरण के कारण सिरोही – शिवगंज और पिंडवाड़ा-आबू विधानसभा के कोटे में कटौती होने का आरोप कांग्रेस में लगने लगा।

सूत्रों की माने तो संयम लोढ़ा की विधानसभा से दस की बजाय 7-8 लोगों को ही इस कार्यकारिणी में जगह मिली। इनमें अनुसूचित जाति के मीणा समाज के किसी व्यक्ति को जगह नहीं मिलने से मीणा समाज में गुस्सा है और इस लेकर वो दो दो हाथ करने को तैयार है। इनका ये आरोप है कि अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पिंडवाड़ा-आबू विधानसभा में अपनी दावेदारी को चुनौती नहीं मिले इस कारण जिला संगठन के ही नेताओं ने ये किया है। कार्यकारणी में खुद सांसद प्रत्याशी रहे वैभव गहलोत की माली समाज के साथ प्रजापत समाज को भी प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

कांग्रेस के असंतुष्ट गुट का आरोप है कि इस बार की कार्यकारिणी में कांग्रेस को मजबूत करने की बजाय उसे कमजोर ही रखने पर ज्यादा जोर दिया गया लगता है। ये इशारा कार्यकारिणी के पदाधिकारियों की विधानसभा वार संख्या से भी लग रहा है। खुद जिलाध्यक्ष ही पिण्डवाड़ा-आबू विधानसभा के कांग्रेस प्रत्याशी भी रहे हैं। लेकिन, दोहरा पद होने के बावजूद उन्होंने खुद इसी विधानसभा से सबसे कम लोगों को अपनी कार्यकारिणी में जगह दी है। आदिवासी बहुल इस सीट पर कांग्रेस 35 सालों से लगातार हार रही है। कार्यकारिणी के माध्यम से सबसे ज्यादा बर्बादी इसी विधानसभा में फैलाई। आरोप ये लग रहा है कि सिरोही से लेकर सरूपगंज तक के करीब 20 किलोमीटर की पूरी पट्टी से एक भी पदाधिकारी इसमें नहीं है। माउंट आबू और किवरली से ही दो-दो पदाधिकारी दे दिए। पार्टी सूत्रों की मानें तो इस विधानसभा से 10 की जगह करीब 7 लोगों को जिला कार्यकारीणी में जगह दी है। जबकि कांग्रेस के कोर वोट बैंक वाली कमजोर सीटों को मजबूत करने पर फोकस करना राहुल गांधी का मुख्य उद्देश्य रहा है। लेकिन कार्यकारिणी में सबसे ज्यादा डेमेज सिरोही और पिण्डवाड़ा-आबू विधानसभा को किया गया है।

 

लीलाराम गरासिया की इस कार्यकारिणी में सबसे ज्यादा जगह रेवदर विधानसभा के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिया गया है। 32 में से सिरोही के आठ और पिण्डवाड़ा आबू विधानसभा सात पदाधिकारियों को छोड़कर शेष 17 पदाधिकारी रेवदर विधानसभा के हैं। पार्टी सूत्रों की मानें मोतीराम कोली ने जो दस नाम भेजे थे उनमें से सिर्फ एक नाम इस कार्यकारणी में हैं, जबकि मोतीराम कोली ने 20 साल बाद इस सीट को कांग्रेस की झोली में डाला है। इनमें से शमशाद अली संयम लोढ़ा के करीबी हैं। इस विधानसभा में जीत की गारंटी मानी जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति कोली जाति को गोविंदसिंह डोटासरा और लीलाराम गरासिया ने जगह ही नहीं दी है। इसे प्रदेश और जिला अध्यक्ष के द्वारा मोतीराम कोली को डेमेज करके अपने लिए जगह बनाने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है।

कार्यकारिणी में कथित मनमानी की वजह राहुल गांधी के उस निर्देश को माना जा रहा है जिसमें जिलाध्यक्षों को मजबूत करने की बात कही थी। सूत्रों के अनुसार इसी का फायदा उठाते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष पर सिरोही जिले की दो विधानसभाओं में कांग्रेस को पूरी तरह से निपटा देने का आरोप लग रहा है।

इस कार्यकारिणी की घोषणा के बाद ये आरोप लग रहा है है कि रेवदर विधानसभा को ही पूरी तरह से हावी कर देने की सारी रणनीति आबूरोड के रिको फेज दो के एक रिसॉर्ट से बनी। वही के मालिक को फिर से इस विधानसभा से लॉन्च करने के लिए ये पूरी रणनीति बनी है। सवाल ये भी उठा कि खुद लीलाराम को पिंडवाड़ा विधानसभा से चुनाव लड़ना है तो वहां से इतनी कम भागीदारी क्यों दी? तो कयास ये लगाया जा रहा है कि पिंडवाड़ा आबू से विधानसभा चुनाव जीतने से आसान आबूरोड पंचायत समिति का प्रधान बनना है। लीलाराम की नजर फिर से आदिवासी के लिए स्थाई आरक्षित इसी पद पर है।

डोटासरा और गरासिया ने राहुल गांधी के जिलाध्यक्ष को मजबूत करने की बात पर तो अमल कर लिया लेकिन उनकी सिरोही में कांग्रेस को जनता की आवाज के लिए संघर्ष करने के मुद्दे पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। इसका ताजा उदाहरण माउंट आबू का मामला है ।

यहां आरोप लगा है कि प्रशासन ने यहां के होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष के होटल का शेड इसलिए तोड़ दिया है क्योंकि एसोसिएशन ने प्रशासन के वेरिफिकेशन के दस्तावेज मांगने का विरोध जताया था और ग्रीष्म महोत्सव में आवश्यक पैसा खर्च करने का आरोप लगाया था। जिस व्यक्ति का शेड तोड़ा उसका दावा है कि उसका निर्माण नियम संगत था। अब मीडिया में ये मुद्दा नहीं उठा रहा है कि पीड़ित कांग्रेस का भी नेता था, लेकिन कांग्रेस जिलाध्यक्ष और उनकी नई कार्यकारिणी राहुल गांधी के कहे अनुसार अपने ही नेता पर हुए कथित अन्याय पर मौन बैठे रहे। यही हादसा सिरोही में होता तो संयम लोढ़ा प्रदेश को सिर पर उठा लेते। वहीं कांग्रेस के ही एक वर्ग की शंका है कि भाजपा के नेताओं के साथ बजरी की लीज उठे बिना अवैध लीज वसूलने , हिस्ट्रीशीटर और कांग्रेस के ही रेवदर विधानसभा के प्रत्याशी की सभा नहीं होने देने के आरोपों से घिरे पदाधिकारियों की कांग्रेस जनता के लिए आवाज किस तरह उठा पाएगी।

कांग्रेस जिलाध्यक्ष लीलाराम गरासिया और रिको फेज टू का रिसॉर्ट संचालक नेता कथित रूप से नीरज डांगी गुट के माने जाते हैं। रेवदर विधानसभा के ही मतदाताओं का कहना है कि डांगी पढ़े लिखे हैं और व्यवहार में भी सौम्यता है लेकिन न तो उनका रेवदर विधानसभा के लोगों के लिए लगातार जूझने का इतिहास रहा है और न ही इनसे नियमित मेल मिलाप का। यहां की जनता अपने लिए संघर्ष करने वाले और आसानी से उपलब्ध नेता की तलाश में है और 20 साल बाद यहां से कांग्रेस के मोतीराम कोली जनता की जीत उसी अपेक्षा का परिणाम है। लेकिन, वो उस अपेक्षा पर खरे नहीं उतर पाए। डांगी गुट के विधायक पद के दावेदार नेताओं का इस तरह का जुझारूपन का तेवर रहा ही नहीं है जो जनता में उनके प्रति आकर्षण जगा पाए।

जिले में कांग्रेस को राहुल गांधी वाले जनता के मुद्दों पर संघर्ष के मॉडल पर सिर्फ एक ही नेता लिए हुए हैं और वो हैं सिरोही विधानसभा के संयम लोढ़ा। सरकार के मंत्री ओटाराम देवासी के माध्यम से सीधे ही सरकार को घेरे हुए हैं। लेकिन नीरज डांगी से विपरीत उनकी समस्या अपने ही कार्यकर्ताओं के प्रति उनका एरोगेंट व्यवहार है। उनके पुराने कार्यकर्ताओं में 2008 से 2018 की तरह फिर से सत्ता में आने पर उनके प्रति लोढ़ा के रूखे व्यवहार में कमी आ जाने का विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। 2023 के चुनाव के ढाई साल बाद भी वे इस बात पर विश्वास करने से हिचकिचा रहे हैं कि आगामी चुनावों में जीतने पर वो अपने पिछले कार्यकाल की तरह उन्हें दरकिनार करके फिर से भाजपा संघ के कार्यकर्ताओं को तरजीह नहीं देंगे।

 

लीलाराम गरासिया की कांग्रेस कितनी संघर्षशील है इसका एक और उदाहरण कार्यकारिणी घोषणा के दूसरे दिन देखने को मिला। नीट का पेपर लीक होने को लेकर हर जिले में कांग्रेस को प्रदर्शन करना था। ये कार्यक्रम जिला स्तरीय था तो जिलाध्यक्ष को ये कार्यक्रम जिला मुख्यालय पर करना था लेकिन इसे औपचारिकता के तौर पर किया आबूरोड शहर में गया। आबूरोड शहर रेवदर विधानसभा में पड़ता है। इसी विधानसभा वो पिंडवाड़ा आबू विधानसभा से आबूरोड से सटे इलाकों से लीलाराम गरासिया की कार्यकारिणी के करीब 21 पदाधिकारी हैं। लेकिन, इनमें से अधिकांश इस प्रदर्शन में नजर नहीं आए। इससे ज्यादा लोग तो इसी विधानसभा में रहने वाली भाजपा की महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष ने विपक्ष में बैठी कांग्रेस को महिला आरक्षण बिल पर घेरने के मामले इकट्ठे कर लिए थे। जिला स्तरीय कार्यक्रम को आबूरोड में के पर सवाल ये भी उठने लगा है कि क्या भाजपा की तरह ही कांग्रेस का भी जिला मुख्यालय सिरोही की जगह आबूरोड स्थानांतरित हो जायेगा।

इस कार्यकारिणी में रेवदर विधानसभा के जिन 17 लोगों को जगह मिली है उनमें आबूरोड के पार्षद भवनीश बारोट को छोड़ दिया जाए तो किसी के भी जनता के हित के लिए यथावत सिस्टम से जूझने की तासीर नजर नहीं आई है। वो भी इनके गुट के नेताओं के द्वारा कई बार अकेले ही छोड़ दिए गए थे। डोटासरा और गरासिया ने राहुल गांधी के जिलाध्यक्ष को मजबूत करने की बात पर तो अमल कर लिया लेकिन उनकी सिरोही में कांग्रेस को जनता की आवाज के लिए संघर्ष करने के मुद्दे पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।

फिलहाल गोविंद सिंह डोटासरा ने जिला कांग्रेस में जिलाध्यक्ष को मजबूत तो दिखा दिया लेकिन इसकी असंतुलित कार्यकारिणी कांग्रेस को जिले में मजबूत कर पाएगी इसमें संशय बरकरार है।

फिलहाल जो आलम है उससे लग रहा है कि इस असंतुलित कार्यकारिणी ने जिले में गुटबाजी को और चरम पर पहुंचाने का रस्ता तैयार कर दिया है। युवा और महिला कांग्रेस की जिला कार्यकारणी की तरह जिला कार्यकारणी के सदस्यों को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर शुभकामना संदेश नहीं देने को जिले में कांग्रेस में नाराजगी और गहरी होने के रूप में देखा जा रहा है। आगामी पंचायत समिति और नगर निकाय चुनाव में गोविन्दसिंह डोटासरा और लीलाराम गरासिया के लिए लिटमस टेस्ट होगा। यहीं से डोटासरा और गरासिया के निर्णयों की पहली अग्नि परीक्षा होगी।