
सबगुरु न्यूज-सिरोही। गोलमोल जांच रिपोर्ट और गोलमोल आदेश के जरिए रामझरोखा की जमीन के पट्टे निरस्त करने के आदेश जिला कलेक्टर ने दे दिए हैं। इस जांच आदेश में पट्टो को निरस्त करने का वो वास्तविक आधार गायब है जिसके चलते इन पट्टों को निरस्त करने की मांग की जा रही थी। वो प्रमुख आधार था सुप्रीम कोर्ट का जनवरी 2021 का आदेश। यूं कलेक्टर के पट्टे को निरस्त करने के आदेश के आधार पर प्रभावित पट्टाधारकों के न्यायालय जाने का आधार माना जा रहा है। ये चर्चा मंगलवार को सिरोही में गर्म थी कि इसके लिए प्रभावित पट्टाधारक एक नेता और एक कथित नेता रूपी समाजसेवी के साथ बैठक भी कर रही हैं। यदि ये मामला हाई कोर्ट जाता है तो मंदिरों की जमीनों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए आदेश की और भी स्पष्ट व्याख्या हो जाएगी।
– अयोध्या के मंदिर के आधार पर बच पाएगी रामझरोखा की जमीन!
कांग्रेस और रामझरोखा को नियंत्रण एवं सलाहकार समिति का इन आठ पट्टों को लेकर जो ज्ञापन दिए हैं उसमें बताया गया है कि ये जमीन मंदिर की है। जबकि जमीन के क्रेताओं और नगर पालिका का दावा इसके विपरीत है। महंत सीताराम दास के शपथ पत्र के आधार पर उनका मानना है कि ये जमीन मंदिर की नहीं होकर सीताराम की निजी संपत्ति है। मध्यप्रदेश के एक मंदिर के विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हेमंत गुप्ता जस्टिस एएस बोपन्ना ने सितंबर 2021 को अयोध्या के मंदिर की जमीन को लेकर दिए गए फैसले के आधार पर निर्णय दिया कि मंदिरों की जमीनें देवताओं की हैं। पुजारी या महंत इसके केयर टेकर हैं। ऐसे में मन्दिरों की सारी जमीनें महंतो और पुजारियों कि जगह मन्दिरों के देवताओं के नाम की जाएं।
– नगर परिषद ने वसीयत को माना हवाला
नगर परिषद ने मंदिर के तत्कालीन महंत जयराम दास को 2002 में विवादित जमीन का अतिक्रमण नियमन पट्टा था। स्थानीय लोगों के अनुसार इस जमीन पर मंदिर के लिए फूल उगाए जाते थे। यानि के कृषि के काम आती थी। वजह दबाव रहा हो या कुछ और आम तौर पर हर छोटी मोटी बात पर काम में अड़ंगा लगा देने वाली नगर पालिका इस मामले कुछ ज्यादा ही लिबरल रही।
जयराम दास को दिए पट्टे के आधार पर 2001 की वसीयत को ध्यान में रखते हुए नगर परिषद ने इस भूमि का 69 ए का पट्टा जयराम दास के विधिक उत्तराधिकारी सीताराम दास के नाम बना दिया। नगर परिषद ने इसके लिए ये आधार दिया कि ये जमीन जयराम दास की वसीयत के बाद नियमित हुई है। ऐसे में इस जमीन को वसीयत हिस्सा मानकर मंदिर की जमीन नहीं माना सकता। लेकिन, जयराम दास को इस विवादित भूमि का पट्टा 2001 को वसीयत लिखे जाने के पहले के कब्जे के आधार पर दिया गया है। वसीयत में बिंदु संख्या 2 में राजमाता धर्मशाला के सामने की तमाम भूमि का जिक्र है।
यूं देखा जाए तो राजमाता धर्मशाला के ठीक सामने रामझरोखा की कोई भूमि नहीं है। कुछ निजी जमीनों के पीछे ये जमीन आती है। विवादित जमीन इसी से जुड़ी हुई है और इसका उपयोग कई दशकों से मंदिर के देवता की पूजा अर्चना के लिए फूल की खेती के लिए किया जाता था। इसी आधार पर 2002 का पट्टा भी जारी किया गया था। क्योंकि वसीयत में इन जमीनों का खसरा नंबर नहीं दिया है,ऐसे में विवादित जमीन भी वसीयत बिंदु संख्या दो का हिस्सा मानी जा सकती है।
– निजी संपत्ति है तो सिद्ध करनी होगी निजी आय
नगर निकायों में काम किस तरह से होते हैं किसी से छिपे नहीं हैं। सीताराम दास अपने शपथ पत्र में विवादित भूमि के उनके गुरु की निजी संपत्ति होने का दावा कर रहे हैं। नगर परिषद ने इसे वसीयत का हिस्सा नहीं होने और निजी भूमि होना मान लिया। अब इसी आधार पर ये मामला उच्च न्यायालय भी जा सकता है। पट्टा निरस्त करने का आधार कलेक्टर ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न मानकर प्रक्रियागत खामी और जमीन के नगर परिषद के नाम दर्ज नहीं होने को माना है। ऐसे में प्रभावितों का न्यायालय में जाने का रास्ता प्रशस्त किया गया है। यदि इसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश हवाला दिया जाता तो इसका वाद कोई भी दूसरा न्यायालय स्वीकार करने से हिचकिचाता । जिला कलक्टर के पट्टा निरस्ती के आदेश के बाद अब वाद तो स्वीकार होगा लेकिन, ये भूमि जयराम दास ने मंदिर की आय से नहीं अर्जित करके खुदकी निजी आय से अर्जित की है ये दावेदार को ही सिद्ध करना होगा।
वैसे तो संन्यास परम्परा में हिंदू उत्तराधिकार अधिनयम नहीं लगता है। गृहस्थ जीवन त्यागने के बाद परिवार से कोई नाता नहीं रहता तो माता पिता की तरफ से वो सम्पत्ति आ नहीं सकती। संन्यास के बाद निजी मेहनत से अर्जित आय व धन भी गुरु और गुरुद्वारा का संकल्प किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट दिसंबर 2025 के आदेश में ये स्पष्ट कर दिया है कि मंदिर को मिला चढ़ावा भी देवता का ही है और उस चढ़ावे अर्जित संपत्ति भी। ऐसे में दावेदार द्वारा 2002 में रामझरोखा का कब्जा नियमन का पट्टा लेने में उपयोग में लिया गया धन तत्कालीन संत जयरामदास की निजी संपत्ति का धन होना सिद्ध नहीं कर पाने पर भी ये जमीन मंदिर की हो जायेगी। तो इस वाद के न्यायालय में जाने पर महत्वपूर्ण माइलस्टोन निर्णय आने की संभावना है।


