अधिकारी ने अपनी जेब की तरह इस्तेमाल किया सिरोही नगर परिषद का खाता! 

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सिरोही नगर परिषद

सबगुरु न्यूज – सिरोही। वो हिसाब जो नगर पालिकाएं सूचनाएं मांगने पर छिपा लेती हैं उस रस्ते से बाहर आई हैं जहां इनका सही से इस्तेमाल कर दिया जाए तो अधिकारियों की कुर्सियां और नेताओं का भविष्य खतरे में आ जायेगा।

जिले की छह में से चार नगर निकायों का कुछ हिसाब किताब बाहर निकला है। इनमें सिरोही नगर परिषद और शिवगंज, पिंडवाड़ा और माउंट आबू की नगर पालिकाएं शामिल हैं। ये निकलवाया है रेवदर विधानसभा के विधायक मोतीराम कोली ने। 2024 में प्रशासकों को नियुक्ति के बाद के इन हिसाब किताब में प्रथम दृष्टया ही कमी सामने आ रही हैं। विस्तृत अध्ययन के बाद ये हिसाब किताब और नगर पालिका चुनाव से पहले हंगामा मचाएगा। प्रथम दृष्टया एक एंट्री बड़ी अजीब लगी जो सिरोही नगर परिषद के आयुक्त के नाम की है।

– खुदने ही उठाए तीन लाख रुपए

लोकसभा चुनाव से पहले जनवरी 2024 में राम मंदिर की प्रतिष्ठा की गई। राजस्थान में 2023 में सरकार बदल गई थी। भाजपा शासन था तो इस प्रतिष्ठा का चुनावी फायदा लेने के लिए हर जिला और ब्लॉक स्तर पर आयोजन हुए। सिरोही में भी विभिन्न कार्यक्रम हुए। विधानसभा में मोतीराम कोली को दिए लिखित जवाब के अनुसार नगर परिषद सिरोही के द्वारा दो भुगतान तत्कालीन कार्यवाहक आयुक्त के नाम की हैं। दो लाख रुपए की एक एंट्री 24 जनवरी की है।

इसमें लिखा है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा पर कवि सम्मेलन में आए कवि को जेब से भुगतान करने पर आयुक्त को लौटाए गए। इसी कार्यक्रम की 29 जनवरी की एक लाख रुपए की एक एंट्री है जिसके आगे लिखा है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में भजन संध्या के लिए जेब से भुगतान करने पर तत्कालीन आयुक्त को लौटाया गया।

– क्या है प्रावधान?

इन एंट्रियों ने दो सवाल खड़े किए। एक ये कि इतनी राशि अपनी जेब से देने का प्रावधान है क्या? दूसरा ये कि प्रावधान है तनख़ाह से इतनी बचत वाकई हो जा रही है क्या कि इतना भुगतान कर सकें? राजस्थान सरकार के अकाउंट्स ऑफिसर्स से इस संदर्भ में पूछा तो बताया कि किसी सरकारी के लिए तुरंत भुगतान के लिए अपनी जेब से दिए जाने वाली राशि की लिमिट तय है। ये लिमिट पांच हजार रुपए है।

इससे अधिक का भुगतान करना और वो राशि सरकारी खाते से अपनी जेब से भुगतान करने के नाम पर फिर उठा लेना भी अनियमितता की श्रेणी में आया है। नगर परिषद में आहरण और वितरण अधिकारी आयुक्त ही होते हैं। लेकिन वहां अकाउंटेंट भी होते हैं जो इस तरह के लेनदेन को नियंत्रित करते हैं। दोनों के जिम्मे ये अनियमितता रोकने की जिम्मेदारी थी। दोनों ने ही ये काम नहीं किया।