अल्पसंख्यकों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता पर पड़ सकता है प्रतिकूल प्रभाव
नई दिल्ली। चीन सरकार द्वारा लागू किए गए नए राष्ट्रीय एकता कानून को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है। संगठनों ने जारी बयान में कहा कि यह कानून राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के नाम पर जातीय अल्पसंख्यक समुदायों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास है, जिससे उनकी भाषा, संस्कृति, धर्म और पहचान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
बयान में कहा कि पिछले कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और स्वतंत्र शोधकर्ताओं की रिपोर्टों में उइघुर, तिब्बती तथा अन्य जातीय अल्पसंख्यक समुदायों के मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। ऐसे में यह नया कानून मौलिक स्वतंत्रताओं को और सीमित करने तथा जबरन आत्मसात (एसिमिलेशन) की नीतियों को बढ़ावा देने का माध्यम बन सकता है।
बयान में कहा गया कि किसी भी देश में सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा नहीं माना जाना चाहिए। अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी भाषा बोलने, अपने धर्म का पालन करने, अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप बच्चों का पालन-पोषण करने तथा अपनी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का अधिकार मिलना चाहिए।
मानवाधिकार संगठनों ने चीन सरकार से अपील की है कि वह जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सम्मान को प्रभावित करने वाली नीतियों को वापस ले तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के तहत अपने दायित्वों का पालन सुनिश्चित करे।
संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी मानवाधिकारों के संभावित उल्लंघनों पर सतर्क रहने, इनके खिलाफ आवाज उठाने और चीन के सभी जातीय अल्पसंख्यक समुदायों की मौलिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विरासत तथा मानवीय गरिमा की रक्षा के प्रयासों का समर्थन करने का आग्रह किया है। बयान के अंत में कहा गया कि न्याय, समानता और मानवाधिकारों के प्रति सम्मान ही राष्ट्रीय एकता की वास्तविक नींव हैं, न कि जबरन थोपी गई एकरूपता।



