रामझरोखा मंदिर मामले में नगर परिषद ने अपनी सहूलियत से इस्तेमाल की महंत जयरामदास अलग-अलग वसीयतें 

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सिरोही नगर परिषद में महंत सीतारामदास के नाम 69 ए का पट्टा जारी करने के लिए जमा शपथ पत्र में दी 20 मार्च 2001 की वसीयत का जिक्र।

सबगुरु न्यूज-सिरोही। रामझरोखा मंदिर की भूमि विवाद को लेकर की गई जांच रिपोर्ट में जितनी गहराई में घुसते जा रहे हैं उतने ही सवालिया निशान सामने आते जा रहे हैं। जांच रिपोर्ट कई तथ्य भी नदारद मिल रहे हैं। रामझरोखा मंदिर के 69 ए के जो पट्टे आठ पट्टाधारकों को दिए गए थे उसकी ऑफलाइन फाइल नहीं चली ऐसा जांच रिपोर्ट में लिखा है। लेकिन, जयरामदास के नाम से 2002 में जारी किया गया जो पट्टा समर्पित करके सीतारामदास के नाम से 69 ए का पट्टा दिया गया उसकी ऑफलाइन फाइल चली है। रामझरोखा की नियंत्रण एवं सलाहकार समिति ने आरटीआई से इसके दस्तावेज निकाले हैं।

महंत सीताराम दास और छह क्रेताओं को पट्टे जारी करने के लिए नगर परिषद ने सहूलियत के अनुसार जिस तरह से अलग अलग वसीयतों का इस्तेमाल किया है वो स्पष्ट बता रहा है कि इस भूमि को खुर्द बुर्द करने में की गई विशिष्ट साजिश में नगर परिषद का भी सक्रिय योगदान रहा होगा। वरना जमीन को खुर्द बुर्द करने के लिए सहूलियत के अनुसार विरोधाभासी दस्तावेजों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। ये बिंदु भी जांच रिपोर्ट से गायब है।

– बाद की वसीयत से सीताराम दास को पट्टा

रामझरोखा के पूर्व महंत जयरामदास की दो वसीयतें सामने हैं। एक 8 मार्च 2001 की, जिसमें सीतारामदास को उत्तराधिकारी बनाते हुए उन्हें समस्त अधिकार दिए गए हैं। दूसरी वसीयत 20 मार्च 2001 की है जिसमें उत्तराधिकारी तो सीताराम दास को ही बनाया गया है लेकिन, उन्हें समस्त अधिकारी नहीं देते हुए एक नियंत्रण और सलाहकार समिति के अधीन रखा गया है। रामझरोखा की विवादित जमीन अतिक्रमित जमीन थी। इस पर लंबे समय से मंदिर के कब्जे के आधार पर इसका पट्टा 2002 में जयराम दास के नाम से बनाया गया था। इस भूमि को वर्तमान में बेचने से पहले जुलाई 2025 में सीताराम दास ने जयराम दास के नाम का पट्टा नगर परिषद को समर्पित किया। इसकी एवज में इसी भूमि का 69 ए का पट्टा सीताराम दास नाम से जारी किया गया। इसी पट्टे के आधार पर ये भूमि आठ टुकड़ों में बांटकर बेची गई।

सीताराम दास को दिए 69 ए के पट्टे की ऑफलाइन फाइल चली थी। उसके दस्तावेज में सीताराम दास का शपथ पत्र मिला है। इस शपथपत्र में सीताराम दास ने 20 मार्च 2001 की वसीयत के आधार पर खुदको इस भूमि का उत्तराधिकारी माना है। नगर परिषद ने भी इसी के आधार पर सीताराम दास के नाम से पट्टा जारी किया है। इस वसीयत में सीताराम दास उत्तराधिकारी तो थे लेकिन, उन्हें मंदिर की जमीन बेचने आदि के अधिकार नहीं थे।

रामझरोखा की भूमि बेचान के लिए किए गए इकरारनामे में 8 मार्च 2001 की वसीयत का हवाला।

-इकरारनामे के आधार पर जारी किए आठ पट्टे

सीताराम दास के नाम से 69 ए के पट्टे जारी होने के बाद इस भूमि को आठ हिस्सों में बांटा गया और इसका विभाजन करने के लिए सिरोही नगर परिषद ने छह अलग-अलग लोगों के नाम से 69 ए के 8 पट्टे जारी किए गए। जांच रिपोर्ट के अनुसार इसकी ऑफलाइन यानी कि फिजिकल फाइल नहीं चली। सूत्रों के अनुसार ऑनलाइन फाइल की भी तथ्यात्मक रिपोर्ट हुई थी। इस तथ्यात्मक रिपोर्ट में जयरामदास से सीताराम दास को जमीन जाने के इतिहास को लिखा गया। बाद सीताराम दास और पट्टा धारकों के नाम से हुए इकरारनामे के आधार पर इन छह पट्टाधारकों के नाम से 69 ए के आठ पट्टे जारी किए गए। यहीं एक और झोल है। वो ये कि नगर परिषद ने सीताराम दास के नाम से 69 ए का पट्टा 20 मार्च 2001 को वसीयत के अनुसार जारी किया और शेष छह पट्टाधारकों को सीतारामदास और पट्टाधारकों के बीच हुए इकरारनामे के आधार पर आठ पट्टे जारी किए गए।

इस इकरारनामें की सत्य प्रति रजिस्ट्रार ऑफिस से आरटीआई से निकाली गई है। ये इकरारनामा 8 मार्च 2001 की वसीयत के अनुसार बना हुआ है। यानि एक ही मामले में अपनी सहूलियत के अनुसार नगर परिषद ने वसीयतों का इस्तेमाल किया। 20 मार्च 2001 को वसीयत में सीताराम दास को रामझरोखा की जमीनें बेचने रहन रखने का अधिकार नहीं है, लेकिन 8 मार्च वाली वसीयत में है। इसलिए आठ पट्टा धारकों को पट्टा जारी करने के लिए 8 मार्च वाली वसीयत काम में की हैं

जांच रिपोर्ट में भी ये बताया गया है कि दो वसीयतें हैं। नियमानुसार अंतिम वसीयत मान्य होती है, लेकिन नगर परिषद ने इस तथ्य को दरकिनार करके दोनों ही वसीयतों को अपनी सहूलियत के अनुसार उपयोग किया।

जांच रिपोर्ट में नगर परिषद ने ये लिख दिया कि ये सिविल न्यायालय का मामला है। लेकिन, सिविल न्यायालय से किसी एक वसीयत के वैध होने का निर्णय होने तक पट्टे जारी नहीं करना नगर परिषद की जिम्मेदारी थी । ये ही फॉल्ट सामान्य व्यक्ति का होता तो नगर परिषद एक वसीयत को वैध करवाए बिना पट्टे जारी नहीं करती। इसमें भी यही करना था। लेकिन, दो वसीयतों का इस्तेमाल करके पट्टे जारी करना बता रहा है कि ये सामान्य नहीं बल्कि असामान्य दबाव में किया गए है फिर वो दबाव राजनीतिक हो या अर्थलाभ पाने का।

 

– एकल हस्ताक्षर पर प्रशासक की सहमति जरूरी 

भजनलाल सरकार ने भी अशोक गहलोत सरकार के नियम फॉलो किया। नगर निकायों में सभापति, अध्यक्ष आदि के अधिकार खत्म करने के लिए पट्टो को सिर्फ प्राधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर से जारी करने का नियम निकाला। लेकिन इस नियम खिलाफ बीकानेर नगर निगम के तत्कालीन अध्यक्ष हाइकोर्ट चले गए। तो न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। फिर भजनलाल सरकार ने भी यही प्रक्रिया अपनाई। लेकिन, तब तक अधिकांश नगर निकायों का कार्यकाल खत्म हो गया था तो वहां पर कलेक्टर और उपखंड अधिकारियों को प्रशासक लगा दिया गया था। ऐसे में अधिकारी अपनी ही सरकार के निर्णयों के खिलाफ न्यायालय में नहीं गए।

 

सरकार ने एकल हस्ताक्षर से पट्टे जारी करने के नियम में एक बाध्यता लागू की थी कि हस्ताक्षर भले ही प्राधिकृत अधिकारी करेगा लेकिन, पत्रावली पर अध्यक्ष या प्रशासक की सहमति आवश्यक होगी। तो रामझरोखा के पट्टे जारी करनें के समय सिरोही नगर परिषद में जिला कलेक्टर प्रशासक थी। उन्होंने अपने अधिकार एडीएम दिनेश सापेला को हस्तांतरित किए थे। ऐसे में यदि दिनेश सापेला के पत्रावली पर हस्ताक्षर नहीं है तो फिर ये पट्टे वैसे ही अमान्य हो जाते हैं। जांच रिपोर्ट में ये तथ्य भी नदारद है कि एकल हस्ताक्षर से पट्टे जारी करने से पहले एडीएम की सहमति हुई थी या नहीं। हुई है तो फिर इसकी जांच के दायरे में नगर परिषद ही नहीं जिला प्रशासन भी आयेगा।