विश्व कल्याण, समता, न्याय व सम्मान की बात करने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है: निंबाराम

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उदयपुर। भारत देव निर्मित प्राकृतिक राष्ट्र है अर्थात् यह भगवान की धरती है। दुनिया में ऐसी कोई पवित्र धरती इस रूप में नहीं है और इसलिए अपने संत कहते हैं कि यहां जिसका जन्म होता है उसको देख कर देवता भी ईर्ष्या करते हैं, कि काश! हमको भी उस धरती पर जन्म लेने का मौका मिले। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम ने ये बात कोटडा में आयोजित विराट हिन्दू सम्मलेन के अवसर पर कही।

इस अवसर पर मातृशक्ति की ओर निकाली गई भव्य कलशयात्रा कोटडा के पीपलेश्वर महादेव मंदिर से प्रारंभ होकर आयोजन स्थल तक पहुंची व जहां धार्मिक उद्घोषों से यात्रा का स्वागत हुआ।

सम्मलेन में बोलते हुए क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम ने कहा कि राजस्थानी में एक गीत है जद दुनिया में मनख जिनावर, दोना में नहीं भेद हो यानी मनुष्य जानवर की तरह रहता था, कच्चा मांस खाता था, नंगा घूमता था। अठे ज्ञान री ज्योत जणेही, घर-घर बचऱ्यो वेद हो। जग शिक्षा लीनी भारत सु, कला, ज्ञान, विज्ञान री, सब सु न्यारी धरती हिंदुस्तान री। समय के साथ परम्पराएं एवं सभ्यताएं बदलती हैं जिसके कई बार हमारे नाम भी बदलते रहे। हम सनातनी हैं, बीच में हम सब आर्य कहलाते थे जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ। आर्य जातिवाचक नहीं है, यह गुणवाचक शब्द है। इसीलिए अपने पूर्वजों ने कहा ‘कृणवन्तो विश्वमार्यम’ अर्थात सारी दुनिया को श्रेष्ठ बनाएंगे।

हिन्दू शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि विदेशियों ने जब हमला किया तो पहचान का संकट बना तब लोगों ने कहा कि ये कौन है? उस काल में हिंदू शब्द आया। हिंदू का अर्थ कोई पूजा पद्धति नहीं है। हिंदू का कोई एक ग्रंथ नहीं, हिंदू का कोई एक देवता नहीं, हिंदू का कोई एक मठ, मंदिर, आश्रम नहीं, हिंदू की कोई एक परंपरा नहीं। यह जो विविधता जितनी भी दिखती है, विविधता में एकता, यह हिंदू की विशेषता है और इसलिए कहा हिंदू एक पूजा पद्धति नहीं है। हिंदू एक पंथ नहीं है, एक मत नहीं है, उपासना नहीं है। हिंदू एक संस्कृति है। हिंदू एक जीवन पद्धति है।

विश्व कल्याण की भावना रखने वाला, दूसरों के प्रति और दया का भाव रखने वाला, समता की बात करने वाला, न्याय की बात करने वाला, सम्मान की बात करने वाला, सबके सुख दुख में सहभागी होने वाला, सबको अपनी परंपराओं की अभिव्यक्ति की छूट देने वाला, सहिष्णुता दिखाने वाला ही हिंदू है। जो लोग जनजाति समाज में इस प्रकार का भ्रम खड़ा करते हैं या अन्य जातिगत भेद उठा कर और अलगाव फैलाते हैं। उनको सफल नहीं होने देना है।

कल्याण आश्रम के सेवा कार्यों की प्रशंषा करते हुए खस कि कल्याण आश्रम ने अपने छात्रावास, आश्रम, आरोग्य केन्द्रों के माध्यम से जनजाति क्षेत्र में सबसे पहले शिक्षा एवं स्वास्थय की अलख कल्याण आश्रम ने जगाई है। ये कोई एहसान ना होकर अपनेपन के भाव के कारण है क्यूंकि हमारा रक्त,पूर्वज, व संस्कृति एक है। सेवा कार्य करना मतलब उपकार नहीं है यह पूर्ण हिन्दू समाज में अपनेपन का भाव,एक दूसरे के सुख दुख में सहभागी बनने के लिए है।

हिन्दू सम्मलेन में संकल्प दिलाते हुए उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि भेदभाव छुआछूत समाप्त हो तथा मनुष्य के नाते मनुष्य से भेदभाव नहीं हो। पर्दा प्रथा, बाल विवाह, महिलाओं को नहीं पढ़ाना, मृत्युभोज, नशाप्रथा की जो कुरीति हमारे में आ गयी है उसे दूर करना होगा साथ ही जो हम खर्च करते हैं, ये शिक्षा में लगाएं, विकास में लगाएं, रोजगार में लगाएं। तो ये जागृति जब आएगी तो भेद भी समाप्त हो जाएगा। हम महापुरुषों को नहीं बाटें।

पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण के साथ जल संरक्षण भी हो व वृक्षों को कटने से बचाएं। हमारे आसपास का वातावरण स्वच्छ हो एवं प्लास्टिक का उपयोग नहीं करें। स्व के जागरण के लिए स्वभाषा, स्वबोली, वेशभूषा को नहीं भूलें। स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करें और स्वावलंबन पर जोर दें। नागरिक कर्तव्यों के पालन के प्रति सजग रहें। संविधान के प्रति, भारत के चिन्हों के प्रति, भारत के महापुरुष, तीर्थ स्थल, परंपराएं इनके प्रति श्रद्धा रखें। संविधान ने केवल अधिकार ही नहीं कर्तव्य भी बताए, उसकी भी हम पालना करें।