भीलवाड़ा। चैत्र नवरात्रि और रामनवमी के पावन अवसर पर हरि शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुई। आश्रम परिसर में इन दिनों भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का विशेष वातावरण देखने को मिला, जहां श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में भागीदारी रही।
महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम उदासीन के सान्निध्य में आयोजित नवचंडी दुर्गा पाठ ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। प्रतिदिन प्रातःकाल मण्डल पूजन, गणपति पूजन और मां भगवती दुर्गा का विधिवत अभिषेक कर हवन-यज्ञ किए गए। वैदिक ब्राह्मणों द्वारा दुर्गा सप्तशती का पाठ श्रद्धापूर्वक संपन्न कराया गया, जिससे श्रद्धालुओं में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ।
दुर्गा अष्टमी पर विशेष हवन का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य अर्जित किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार हवन से वातावरण शुद्ध होता है और मन में शांति एवं सकारात्मकता का भाव उत्पन्न होता है।
रामनवमी के दिन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव को धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर कन्या पूजन का विशेष आयोजन हुआ, जिसमें कन्याओं के चरण पखारकर उन्हें तिलक लगाया गया और भंडारा प्रसाद अर्पित किया गया। श्रद्धालुओं ने पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर भगवान श्रीराम के आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
स्वामी हंसराम उदासीन ने बताया कि रामनवमी सनातन धर्म का महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह दिन धर्म की स्थापना, मर्यादा और सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि नवरात्रि और रामनवमी का यह संगम श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है।
पूरे आयोजन के दौरान आश्रम परिसर में भजन-कीर्तन, मंत्रोच्चार और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने वातावरण को पूर्णतः आध्यात्मिक बना दिया। हर कोई भक्ति रस में डूबा नजर आया। स्वामी जी का चैत्र नवरात्रि के दौरान लिया गया मौन संकल्प भी रामनवमी के दिन पूर्ण हुआ। उन्होंने सभी सनातन धर्मियो से आव्हान किया कि अपने राष्ट्र और अपने सनातन के लिए सनातन संस्कृति के धार्मिक महत्व वाले उत्सव अपनी परंपरा रीति-रिवाज अनुसार मनाएं।
पिछले दिनों अजमेर में एक कार्यक्रम के दौरान माता के मंच पर कव्वाली का प्रोग्राम हुआ व शखी शहबाद कलंदर, दमादम मस्त कलंदर जैसे सूफ़ी गानों ओर इस तरह के आयोजनों से बचना चाहिए। अपनी मूल जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिए। इस दौरान संत मायाराम, राजाराम, गोविन्द राम, केशव राम, ब्रह्मचारी मिहिर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु गण उपस्थित रहे।



