इस तरह मनाएं हनुमान जन्मोत्सव, करें हनुमानजी की उपासना

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शक्ति, भक्ति, कला, चातुर्य तथा बुद्धिमत्ता में श्रेष्ठ होते हुए भी प्रभु रामचंद्रजी के चरणों में सदैव लीन रहने वाले हनुमान के जन्म का इतिहास, हनुमान जन्मोत्सव पूजाविधि तथा हनुमान उपासना का शास्त्र सनातन संस्था की ओर से संकलित यहां प्रस्तुत है।

1. जन्म का इतिहास : राजा दशरथजी ने पुत्रप्राप्ती के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया। तब अग्निदेव यज्ञ से प्रकट हुए और दशरथ की रानियों के लिए खीर (यज्ञ में अवशिष्ट प्रसाद) प्रदान किया। अंजनी, जो दशरथ की रानी की तरह तपस्या कर रही थी, उन्हें भी यह प्रसाद मिला और इसी कारण हनुमान का जन्म हुआ। उस दिन चैत्र पूर्णिमा थी। यह दिन हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है।

2. पवनपुत्र मारुतिने ‘हनुमान’ नाम कैसे धारण किया? : जन्म होने के बाद उगते सूर्य का लाल गोला देखकर उसे पका फल समझकर हनुमान ने आकाश में सूर्य की दिशा में उडान भरी। इस पर इंद्र ने क्रोधित होकर उन पर अपना वज्र फेंका। इंद्र के वज्र मार ठोडी पर लगने के कारण उनका हनुमान नाम पडा। हनुमान शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है हनुः अस्य अस्ति इति। अर्थात जिसकी ठोडी विशेष है, ऐसे वज्रांग (वज्र समान अंग है जिसका) कहलाने लगे। उसी का अपभ्रंश होकर बजरंग नाम पडा।

3. हनुमान जयंती की पूजाविधि : हनुमानजी का जन्मोत्सव प्रातः सूर्योदय के समय मनाया जाता है। हनुमानजी की मूर्ति अथवा प्रतिमा की यथासंभव पंचोपचार अथवा षोडशोपचार पद्धति से पूजा करनी चाहिए। सूर्योदय के समय शंखनाद कर पूजा आरंभ करें। भोग लगाने के लिए सोंठ और चीनी का मिश्रण ले सकते हैं। पश्‍चात वह मिश्रण प्रसाद के रूप में सबको बांटे। हनुमानजी को मदार (रुई) के फूल-पत्तों का हार अर्पण करें। पूजा के उपरांत श्रीराम एवं श्रीहनुमान की आरती करें।

4. हनुमानजी की उपासना के अंतर्गत विविध कृतियां : हनुमानजी के मूर्ति को तिल का तेल, सिंदूर, मदार के पत्ते व फूल अर्पण करने का कारण : तिल का तेल, सिंदूर एवं मदार के फूल तथा पत्ते इन वस्तुओं में हनुमानजी के सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्व आकृष्ट करने की क्षमता होती है। इसीलिए हनुमानजी को तिल का तेल, सिंदूर एवं मदार के पुष्प-पत्र इत्यादि अर्पण करते हैं। कुछ स्थानों पर हनुमानजी को नारियल भी चढाते हैं। हनुमानजी की पूजा विधि में केवडा, चमेली या अंबर, इन उदबत्तियों का उपयोग करें। हनुमानजी का पंचतत्वों पर नियंत्रण होने का प्रतीक उन्हें पांच या पांच की गुणा में परिक्रमाएं करें तथा इन्हीं संख्या में फुल अर्पण करें।

5. मारुति को नारियल अर्पण करने की पद्धति : हनुमान को नारियल अर्पण करने की प्रथा पूर्वापार चली आ रही है। नारियल अर्पण करने से पहले हनुमान की मूर्ति के सामने नारियल की शेंडी मूर्ति की ओर करके नारियल हाथ में लेना चाहिए। हनुमान के सात्त्विक स्पंदन नारियल में आने के लिए हनुमान से प्रार्थना करनी चाहिए। उसके बाद नारियल फोड़कर उसका आधा भाग अपने लिए रखना चाहिए और शेष आधा भाग वहां की स्थानदेवता को अर्पण करना चाहिए।

6. आध्यात्मिक कष्ट एवं शनि ग्रह पीडा निवारणार्थ हनुमानजी की उपासना : शनि की साढेसाती के प्रभाव को न्यून (कम) करने के लिए, आसुरी शक्तियां तथा आध्यात्मिक कष्टसे रक्षा करने हेतु हनुमानजी की उपासना विशेष फलदायी होती है I

7. नामजप एवं हनुमान चालीसा का पाठ : हनुमान जयंती के दिन नित्य की तुलना वातावरण में हनुमानतत्त्व 1 सहस्र गुना अधिक सक्रिय रहता है । उसका आध्यात्मिक स्तर पर लाभ प्राप्त करने के लिए घर में सब लोग एक साथ बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा दिनभर श्री हनुमते नम: ऐसा नामजप अधिकाधिक करें।

8. बलोपासना कर हनुमानजी की कृपा प्राप्त करें : धर्म-अधर्म की लडाई में महत्त्वपूर्ण देवता अर्थात हनुमानजी ने त्रेतायुग में रावण के विरुद्ध युद्ध में प्रभु श्रीराम को सहकार्य किया जबकि द्वापारयुग में महाभारत के भयंकर लडाई में वे कृष्णार्जुन के रथ पर विराजमान थे। हिंदुस्थान में मुगल सत्ता असीम अत्याचार कर रही थी, उस समय महाराष्ट्र में बलोपासना का महत्व अंकित करने हेतु समर्थ रामदासस्वामी जी ने हनुमानजी की मूर्ति की 11 स्थानों पर स्थापना की तथा हिंदुओं में हिंदवी स्वराज्य की स्थापित करने की चेतना जगाई। इसलिए हनुमान जयंती की पार्श्‍वभूमि पर बलोपासना के साथ भगवान की भक्ति करने का संकल्प करेंगे।

हनुमान जी को प्रार्थना : हनुमान जयंती के निमित्त हम हनुमान जी के चरणों में शरण जाकर प्रार्थना करें कि, हे हनुमान जी, अपने जैसे श्रीराम जी की भक्ति की, वैसी भक्ति मुझे भी करने के लिए सिखाएं। धर्मरक्षण के लिए मुझे भक्ति और शक्ति दे, यह आपके चरणों में प्रार्थना है।

संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ ‘श्री हनुमान’