तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक पार्टी में दोफाड़, बागी विधायक करेंगे विजय का समर्थन

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चेन्नई। तमिलनाडु की सियासत में कभी बेहद ताकतवर पार्टी रही अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (अन्नाद्रमुक) मंगलवार को एक बार फिर संकट में फंस गई जब पार्टी के बागी विधायकों ने यह ऐलान कर दिया कि वे बुधवार को मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ टीवीके सरकार के विश्वास प्रस्ताव का समर्थन करेंगे।

यूं तो चुनाव परिणामों के बाद से ही आग सुलगने और धुंआ उठने के संकेत मिलने लगे थे, लेकिन अब यह साफ हो गया है कि अन्नाद्रमुक की कमान संभाले एडप्पाडी के पलानीस्वामी (ईपीएस) के विरोधी और पार्टी के बागी नेताओं ने खुलकर टीवीके सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है।

पार्टी का विभाजन विधानसभा में तब शीशे की तरह साफ दिखा जब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव हुआ। सदन में विपक्षी दलों की ओर से बोलने के लिए दो अलग-अलग नेताओं को मौका दिया गया। एक ओर ईपीएस गुट के 17 विधायकों ने पलानीस्वामी को अपना नेता चुना, तो दूसरी ओर बागी खेमे ने कद्दावर नेता एसपी वेलुमणि को अपना विधायक दल का नेता घोषित किया। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के कुल 47 विधायक हैं।

पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता सीवी षणमुगम ने विधानसभा की कार्यवाही में शामिल होने से ठीक पहले अपने आवास पर बागी विधायकों के साथ परामर्श के बाद संवाददाताओं से कहा कि जब टीवीके सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और वह बहुमत के जादुई आंकड़े (118) से 11 कदम दूर थी, तब पलानीस्वामी ने यह सुझाव दिया कि अन्नाद्रमुक को द्रमुक से समर्थन लेकर उन्हें (ईपीएस को) मुख्यमंत्री बनाना चाहिए।

बागी नेता षणमुगम ने कहा कि अन्नाद्रमुक की स्थापना ही द्रमुक के विरोध के लिए हुई थी। अगर हम उनके साथ गठबंधन करते हैं, तो पार्टी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। विधायक इस सुझाव से स्तब्ध थे और उन्होंने इसे मानने से इनकार कर दिया।

षण्मुगम ने साफ किया कि उनका इरादा पार्टी को तोड़ने का नहीं बल्कि उसे दोबारा जिंदा करने का है। उन्होंने मांग की कि अन्नाद्रमुक की बैठक तुरंत बुलाई जाए। बागी गुट ने औपचारिक प्रस्ताव पारित कर राजग गठबंधन के तहत मिली हार को स्वीकार किया और फैसला किया कि पार्टी अब स्वतंत्र रूप से काम करेगी और संगठन को फिर से खड़ा करने पर ध्यान देगी।

बागी खेमे ने अपनी नई टीम की भी घोषणा कर दी है। इसमें कहा गया है कि विधायक दल के नेता एसपी वेलुमणि के अलावा उप-नेता के हरि होंगे जबकि सचेतक का काम सी विजय भास्कर और सचिव का काम आर कामराज करेंगे। इस गुट ने अपनी नियुक्ति के पत्र प्रोटेम स्पीकर को सौंप दिए हैं। उधर, ईपीएस गुट ने भी अपनी अलग सूची सौंपी है। अब सभी की निगाहें नवनिर्वाचित स्पीकर जेसीडी प्रभाकरन के फैसले पर टिकी हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा अध्यक्ष के सामने तीन विकल्प हैं। पहले विकल्प में वे ईपीएस गुट को मान्यता दे सकते हैं। अगर स्पीकर ईपीएस गुट को असली अन्नाद्रमुक मानते हैं, तो उनके व्हिप का आदेश मानना सभी विधायकों के लिए अनिवार्य होगा। उल्लंघन करने पर दलबदल कानून के तहत अयोग्यता का खतरा हो सकता है।

दूसरा विकल्प यह है कि वह बागी गुट को मान्यता दें। अगर संख्या बल के आधार पर बागी गुट को मान्यता मिलती है, तो वे सरकार को समर्थन देकर श्री विजय की कुर्सी बचाने में मददगार हो सकते हैं। इसके अलावा अगर वे फैसला टालते हैं तो विधायक स्वतंत्र सदस्यों की तरह वोट कर सकेंगे और व्हिप का आदेश प्रभावी नहीं होगा।

बता दें कि इससे पहले 2017 में जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक संकट में आ गई थी और अब 2026 में, मुख्यमंत्री विजय के सत्ता संभालने के एक हफ्ते के भीतर अन्नाद्रमुक फिर से उसी दोराहे पर खड़ी है।