नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस में जारी अंदरूनी संकट सोमवार को और गहरा गया जब पार्टी के कुछ बागी सांसदों ने कथित तौर पर नयी दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठक की।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब तृणमूल प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता को मजबूत करने के लिए इंडिया गठबंधन के नेताओं के साथ चर्चा में व्यस्त थीं।
यह घटनाक्रम तृणमूल राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा देने के कुछ ही घंटे बाद सामने आया, जिससे पार्टी के संसदीय दल में बढ़ते असंतोष की अटकलों को और बल मिला है तथा संगठन पर ममता बनर्जी की पकड़ को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
रिपोर्टों के अनुसार रॉय कई तृणमूल सांसदों के साथ केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र यादव के आवास पहुंचे। बताया जाता है कि यह बैठक राष्ट्रीय राजधानी स्थित यादव के आवास पर हुई, जो उस स्थान से अधिक दूर नहीं है जहां ममता बनर्जी आगामी मानसून सत्र से पहले साझा रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से विपक्षी नेताओं के साथ बैठक कर रही थीं।
सूत्रों के अनुसार बैठक में तृणमूल के कई लोकसभा सांसद शामिल थे। इनमें प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया, अरूप चक्रवर्ती, कालिपद सोरेन और असित कुमार माल के नाम सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में मथुरापुर के सांसद बापी हलदार की मौजूदगी का भी दावा किया गया है।
बाद की रिपोर्टों में कहा गया कि बैठक में शामिल सांसदों की संख्या 10 से अधिक थी और शताब्दी रॉय, काकोली घोष दस्तीदार, अबू ताहेर खान तथा खलीलुर रहमान भी चर्चा में शामिल हुए।
बैठक के राजनीतिक महत्व को उस समय और बल मिला जब ऐसी खबरें सामने आयीं कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी वहां मौजूद थे। रॉय तथा तृणमूल विधायक अखरुज्जमान के भी बैठक में शामिल होने की बात कही गई है।
इस बैठक ने एक बार फिर तृणमूल के संसदीय दल में संभावित तालमेल की अटकलों को जन्म दे दिया है। यह स्थिति ऐसे समय बनी है जब ममता बनर्जी हालिया चुनावी झटकों के बाद पार्टी में स्थिरता बनाए रखने और विपक्षी एकता का संदेश देने का प्रयास कर रही हैं।
दिल्ली में हुए इस घटनाक्रम से पहले पश्चिम बंगाल में भी पार्टी के भीतर अभूतपूर्व उथल-पुथल देखने को मिली थी। रिपोर्टों के अनुसार विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल विधायकों का एक बड़ा वर्ग पार्टी नेतृत्व से दूरी बनाता दिखाई दिया।
बागी खेमे का दावा है कि तृणमूल के टिकट पर निर्वाचित 80 विधायकों में से 60 ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाते हुए निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में समर्थन दिया। इसके बाद इस समूह ने स्वयं को वास्तविक तृणमूल बताया और कथित तौर पर ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार की भूमिका सौंपने की घोषणा की। इसे पार्टी की स्थापना के बाद से ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
ताजा घटनाक्रम से संकेत मिलता है कि कोलकाता से शुरू हुआ यह विद्रोह अब राष्ट्रीय राजधानी तक पहुंच गया है, जिससे पार्टी के संसदीय दल की एकजुटता और व्यापक विपक्षी राजनीति में उसकी भविष्य की भूमिका को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। तृणमूल नेतृत्व और बागी सांसदों में से किसी ने भी बैठक को लेकर आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। भाजपा ने भी बैठक के उद्देश्य और परिणामों पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
ऐसे समय में जब ममता बनर्जी विपक्षी रणनीति बैठक में भाग ले रही थीं, उसी दौरान बड़ी संख्या में तृणमूल सांसदों का भाजपा नेताओं से मुलाकात करना राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का विषय बन गया है और पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा को लेकर अटकलों को और तेज कर सकता है।
एक दशक से अधिक समय तक ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की राजनीति पर प्रभुत्व रखने वाली तृणमूल कांग्रेस अब अपने इतिहास की सबसे गंभीर आंतरिक चुनौतियों में से एक का सामना करती दिखाई दे रही है। इस्तीफों, खुले असंतोष और संगठन के भीतर समानांतर शक्ति केंद्रों के उभरने की खबरों के बीच सोमवार का घटनाक्रम पार्टी के राजनीतिक और संसदीय भविष्य को लेकर बढ़ती अनिश्चितता को रेखांकित करता है।



