सिरोही में एक ही दिन होगा भाजपा और कांग्रेस जिलाध्यक्ष का लिटमस टेस्ट

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सिरोही में भाजपा और कांग्रेस जिलाध्यक्षों का लिटमस टेस्ट

सबगुरु न्यूज-सिरोही। स्थानीय निकाय चुनावों का प्रथम चरण सिर्फ इसमें हिस्सा लेने वाले प्रत्याशियों की परीक्षा नहीं होगी बल्कि सिरोही भाजपा जिलाध्यक्ष रक्षा भंडारी और कांग्रेस जिलाध्यक्ष लीलाराम गरासिया की भी पहली परीक्षा होगी। ये लिटमस टेस्ट होगा इस बात का कि ये दोनों जिले में अपने संगठन को कितना मजबूत कर पाए और कितना आगे ला पाए हैं।

राज्य चुनाव आयोग ने प्रथम चरण मे ही भाजपा जिलाध्यक्ष रक्षा भंडारी और कांग्रेस जिलाध्यक्ष लीलाराम गरासिया के मूल स्थान की ही परीक्षा रख दी है। पहले चरण मे सिरोही जिले में शिवगंज नगर पालिका और आबूरोड नगर पालिका का चुनाव है। शिवगंज भाजपा जिलाध्यक्ष रक्षा भंडारी का गृहक्षेत्र है। तो आबूरोड कांग्रेस जिलाध्यक्ष लीलाराम गरासिया का कार्यक्षेत्र। प्रधान के रूप में उनका कार्यालय आबूरोड नगर पालिका क्षेत्र में ही रहा है।

रक्षा भंडारी को उन्हीं के घर शिवगंज से शुरुआती चुनौती मिल गई। दरअसल, वहां पालिकाध्यक्ष पद के तीन दावेदार सामने आए हैं। दिनेश बिंदल, ताराराम और राजेन्द्र सोलंकी। दिनेश बिंदल सामान्य वर्ग से हैं। वहीं बाकी दोनों ओबीसी हैं। बिंदल भाजपा के पुराने नेताओं में हैं। जिलाध्यक्ष पद के दावेदार भी रहे हैं। लेकिन, इनके समेत कई नेताओं को दरकिनार करके प्रदेश संगठन ने रक्षा भंडारी को जिलाध्यक्ष बना दिया था।

पार्टी सूत्रों के अनुसार शिवगंज के भावी पालिकाध्यक्ष के रूप में दावेदारी कर रहे नगर मंडल अध्यक्ष ताराराम रक्षा भंडारी के विश्वसतों में माने जाते हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार ऐसे में कोशिश ये थी कि वो किसी सेफ वार्ड से चुनाव लडें। उनके लिए शिवगंज के वार्ड संख्या 12 को प्राथमिकता दी गई। लेकिन, इस वार्ड से दिनेश बिंदल शुरू से ही दावेदारी जता रहे थे। संगठन उन्हें 16 मे जाने को कह रहा था। वार्ड संख्या 16 दोनों के लिए संघर्ष वाला वार्ड था। बिंदल की व्यक्तिगत तैयारी वृहद स्तर पर है। ऐसे में वार्ड 12 से ही चुनाव लडने को लेकर उनके तेवर थोडे तल्ख रहे।

भाजपा सूत्रों के अनुसार पालिकाध्यक्ष बनने के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं तो जिला नेतृत्व के निर्णय को चुनौति देते हुए उनके अपने भी 35 वार्डों में पूरी तैयारी थी। शिवगंज में बढ़ती बढती तल्खियो की वजह से शिवगंज में बोर्ड पर मंडराते खतरे को देखते हुए दूसरे नेताओं के हस्तक्षेप से जिला नेतृत्व को बैकफुट पर जाने को मजबूर होना पडा। पार्टी सूत्रों का दावा है कि बिंदल के वार्ड संख्या 12 से लडने पर सहमति बन गई है। वहीं ताराराम वार्ड संख्या 16 या अन्य वार्ड से। सोशल मीडिया पर दिनेश बिंदल वार्ड संख्या 12 से भाजपा का झंडा लेकर प्रचार करते हुए नजर आ रहे हैं। इससे ये लगता है कि सहमति बन गई है और यदि नहीं भी बनी है तो वो उसी वार्ड से चुनाव लड़ेंगे।

लेकिन, रक्षा भंडारी की चुनौति अभी खत्म नहीं हुई है। पालिकाध्यक्ष बनने के लिए बिंदल को अपने समर्थक पार्षदों की भी जरूरत होगी ऐसे में भाजपा उनके समर्थित कितने लोगों को वार्डों से टिकिट देती हैं ये 31 को पता चलेगा। यदि बिंदल की जगह यहां से ताराराम समर्थक लोगों को ज्यादा टिकिट देती है तो फिर से वार्डों में भाजपा की निर्दलीयों को चुनौति को झेलनी पडेगी।

ये तो शिवगंज की वो चुनौति है जो सामने दिख रही है। एक चुनौति भीतरघात वाली भी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार जिलाध्यक्ष के रूप में तीनों विधानसभाओं में कथित दखलंदाजी से भी भाजपा के एक गुट में जबरदस्त नाराजगी है। इसे लेकर ये सब लोग करीब चार महीने पहले प्रदेश अध्यक्ष से भी मिले थे। प्रदेश अध्यक्ष ने भी इस पर काफी नाराजगी दिखाई थी। रक्षा भंडारी के द्वारा घोषित की गई जिला और मंडल की कार्यकारिणी में वंचित रह गए लोगों की नाराजगी भी कम नहीं है। कांग्रेस के निशाने पर भी रक्षा भंडारी के प्रमुख सिपहसालार हैं।

बिंदल के अलावा शिवगंज में उन लोगों की चुनौती भी है जिन लोगों को जिलाध्यक्ष की दौड से हटाकर जयपुर से जिलाध्यक्ष के रूप में प्रतिस्थापित हुईं । इस सब पर उनका सामना कांग्रेस के उस नेता से है जो रणनीति के मामले में जिले में ही नहीं प्रदेश में कांग्रेस के मजबूत नेताओं के रूप में जाना जाता है। अभी राजेंद्र सोलंकी वाला फैक्टर तो अनसुलझा है। उन्हें इसलिए टॉप प्रायरिटी पर नहीं माना जा रहा है कि उनके परिवार की सदस्या 2014 में वहां की पालिकाध्यक्ष रही थीं। सोलंकी वाला फैक्टर किसके पक्ष में जाता है ये भी महत्वपूर्ण है। वैसे बिंदल के वार्ड संख्या 12 के स्थानीय नहीं होने को लेकर भी आवाजें उठने लगी हैं। 31 को पता चलेगा कि उंट किस करवट बैठेगा।

यूं सिरोही और शिवगंज को सब लोग रक्षा भंडारी के साथ ओटाराम देवासी और लुंबाराम चौधरी की साख से भी जोड़कर देख रहे हैं। लेकिन, इसकी संभावनाएं इसलिए कम है कि दोनों ही अपने जातिगत वोटरों की वजह से जगह बनाए हुए हैं। 2009 का चुनाव इसका उदाहरण है, जब पालिकाध्यक्ष के सीधे चुनाव होने पर भी भाजपा दोनों जगह पालिकाध्यक्ष के पद गवां बैठी थी। फिर भी जातिगत वोटों आधार ओटाराम देवासी को फिर विधानसभा का  और देवजी पटेल को लोकसभा का टिकिट मिला। लेकिन, रक्षा भंडारी के पास वोट बैंक की ये ढाल भी नहीं है।

कांग्रेस जिलाध्यक्ष राज्यसभा सांसद नीरज डांगी के खेमे के हैं। आबूरोड इनका कार्यक्षेत्र रहा है। लीलाराम गरासिया के पास मुख्य चुनौति आबूरोड को पाने की है। यहां पर दो बार से लगातार भाजपा का बोर्ड बन रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार लीलाराम गरासिया ने जिला कार्यकारिणी में राज्यसभा सांसद के गुट के रेवदर विधानसभा के कार्यकर्ताओं को भर लिया है इसकी शिकायत कांग्रेस की संभाग स्तरीय बैठक में गई थी। इसी को लेकर प्रदेश संगठन ने नाराजगी भी दिखाई थी। इस कार्यकारिणी में यहां के विधायक मोतीराम कोली के द्वारा सुझाए गए नाम में से भी एक नाम को ही जगह देने का आरोप लगा। पिछले एक पखवाडे में हुए इस घटनाक्रम से ये इशारा मिल रहा है कि आबूरोड में लीलाराम को गुटबाजी का सामना करना पडेगा।

यहां पर संयम लोढा और नीरज डांगी के गुटों के बीच हितों के टकराव की स्थितियां रही हैं। दोनों ही गुटों के नेताओं ने यहां की पालिकाध्यक्ष की सीट सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने के कारण अपने या अपने परिवार की महिलाओं के लिए वार्ड सुरक्षित तो कर लिए हैं लेकिन, पालिकाध्यक्ष बनने के लिए 21 पार्षदों का जुगाड कहां से और कैसे होगा इसकी रणनीति के बारे में कोई रूटमैप सामने नहीं आया है।

हाल में वायरल एक ऑडियो ने तो आबूरोड में कांग्रेस के अनुसूचित जाति के प्रमुख वोटबैंक में सेंधमारी की ओर इशारा कर दिया है। इस ऑडियो में एक व्यक्ति खुदको कांग्रेस समर्थक बताते हुए माहौल को देखकर भाजपा से टिकिट की दावेदारी करने की बात कहता सुनाई दे रहा है। शहर में चर्चा ये है कि ये आवाज कांग्रेस का वोट बैंक रही अनुसूचित जाति के नेता की है जो कांग्रेस की बजाय भाजपा में भविष्य देख रहा है।

कांग्रेस के मूल वोट बैंकों को इस तरह छिटकना आबूरोड में लीलाराम के लिए एक और चुनौति है। यूं मोतीराम कोली यहां के विधायक हैं। लीलाराम के साथ उनका भी आबूरोड से कनेक्ट कम ही रहा है। आबूरोड में कांग्रेस को अपने गुटों के छोटे नेताओं के भरोसे छोड देने के बाद यहां के लोगों में कांग्रेस के प्रति विश्वास नहीं पनप पाने की चुनौति का सामना भी लीलाराम को करना है क्योंकि संगठन के समर्थकों का विस्तार करने का काम जिलाध्यक्ष का है।

यूं भी इनके जिलाध्यक्ष बनने के बाद लीलाराम गरासिया आबूरोड की तमाम समस्याओं को लेकर कोई आंदोलनात्मक रूख आबूरोड में नहीं दिखा पाए हैं जिसके लिए राहुल गांधी ने जिलाध्यक्षों को फ्री हेण्ड दिया था। इसे जनता में कांग्रेस के प्रति विश्वास पैदा करने का प्रमुख आधार माना जा रहा था। आबूरोड में आवेदकों के वन टू वन बैठक के बाद भाजपा ने अपने यहां आवेदकों की संख्या जारी कर दी। कांग्रेस के द्वारा आवेदकों की संख्या जारी नहीं किये जाने को भी यहां शक की नजर से देखा जा रहा है। यहां चर्चा ये है कि कांग्रेस को सौ आवेदक भी नहीं मिले हैं। कई वार्ड में एक-एक आवेदक तो कई में एक भी आवेदक सामने नहीं आया है। यदि ऐसा है तो आबूरोड में कांग्रेस जिलाध्यक्ष के लिए यहां स्थिति चिंताजनक ही मानी जा सकती है।

कुल मिलाकर इन दोनों शहरों में 14 सितम्बर को शिवगंज के विषय में रक्षा भंडारी और आबूरोड के विषय में लीलाराम गरासिया कितने अंक लाते हैं ये महत्वपूर्ण है। इसके बाद भी सिरोही, पिण्डवाडा, माउण्ट आबू और मंडार नगर निकाय के विषय के परिणाम भी इनकी सफलता की कसौटी को तय करेंगे।