अजमेर। यदि टिकट से असंतुष्ट भाजपा कार्यकर्ता या स्थानीय दावेदार निर्दलीय उम्मीदवारों के साथ खड़े होते हैं तो कई वार्डों में मुकाबला बदल सकता है। मसलन, किसी वार्ड में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बहुत करीबी है और भाजपा के कुछ हजार वोट किसी निर्दलीय उम्मीदवार की तरफ चले जाते हैं, तो निर्दलीय उम्मीदवार भले ही चुनाव न जीते, लेकिन वह परिणाम तय करने वाली ताकत बन सकता है। यही ‘वोट कटवा’ या ‘वोट विभाजन’ की राजनीति भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगी।
अजमेर उत्तर पर सबसे ज्यादा नजर
धर्मेंद्र गहलोत के राजनीतिक प्रभाव का सबसे बड़ा परीक्षण अजमेर उत्तर में होने की संभावना है। यदि यहां उनके समर्थक सक्रिय होकर दूसरे वार्डों में उम्मीदवारों के समर्थन में उतरते हैं तो भाजपा को अपने पुराने नेटवर्क को संभालने की चुनौती होगी। हालांकि दूसरी तरफ भाजपा के पास भी मजबूत संगठनात्मक ढांचा है। ऐसे में केवल गहलोत के भाजपा छोड़ने से यह मान लेना कि पूरा भाजपा वोट बैंक उनके साथ चला जाएगा, राजनीतिक रूप से सही आकलन नहीं होगा।असल लड़ाई व्यक्तिगत लोकप्रियता बनाम संगठनात्मक ताकत की होगी।
क्या कांग्रेस को बैठे-बिठाए फायदा मिलेगा?
गहलोत की बगावत का सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष फायदा कांग्रेस को मिलने की संभावना राजनीतिक चर्चा का विषय है। यदि भाजपा के वोट तीन हिस्सों में बंटते हैं-भाजपा, निर्दलीय और कुछ हद तक कांग्रेस—तो कांग्रेस कई करीबी वार्डों में बढ़त हासिल कर सकती है। लेकिन कांग्रेस के लिए भी यह जोखिम है कि मजबूत निर्दलीय उम्मीदवार उसके पारंपरिक वोटों में सेंध लगा दें। इसलिए गहलोत फैक्टर को सीधे तौर पर कांग्रेस के पक्ष में मानना भी जल्दबाजी होगी।गहलोत फैक्टर का पहला असर वोटों के विभाजन के रूप में सामने आएगा; जीत किसे मिलेगी, यह वार्डवार समीकरण तय करेंगे।
क्या गहलोत ‘किंगमेकर’ की भूमिका में आ सकते हैं?
अजमेर नगर निगम में 80 वार्ड हैं। ऐसे में यदि कई वार्डों में मुकाबला बेहद करीबी रहता है तो कुछ निर्दलीय उम्मीदवार निर्णायक भूमिका में आ सकते हैं।यहीं धर्मेंद्र गहलोत की राजनीतिक भूमिका चुनाव परिणाम के बाद भी महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि उनके समर्थक कई वार्डों में जीत दर्ज करते हैं या किसी एक दल को बहुमत से दूर रखने में भूमिका निभाते हैं, तो गहलोत स्वयं चुनाव न लड़कर भी ‘किंगमेकर’ की भूमिका में दिखाई दे सकते हैं। लेकिन यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितने वार्डों में प्रभावी संगठन खड़ा कर पाते हैं।
गहलोत के सामने भी बड़ी परीक्षा
इस कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। धर्मेंद्र गहलोत के सामने अब अपनी राजनीतिक ताकत साबित करने की चुनौती है। भाजपा में रहते हुए उनके साथ संगठन और पार्टी का बड़ा ढांचा था। अब उन्हें व्यक्तिगत नेटवर्क के आधार पर अपनी राजनीतिक क्षमता दिखानी होगी। यदि हेमा गहलोत वार्ड 4 में मजबूत प्रदर्शन करती हैं और उनके समर्थक दूसरे वार्डों में भी प्रभाव दिखाते हैं तो गहलोत की राजनीतिक हैसियत निश्चित रूप से मजबूत होगी। लेकिन यदि उनका प्रभाव सीमित रहता है तो भाजपा यह संदेश देने में सफल हो सकती है कि संगठन व्यक्ति से बड़ा है।
31 अगस्त के बाद खुलेगा असली पत्ता
नामांकन की प्रक्रिया पूरी होने और नामांकन वापसी के बाद अजमेर के राजनीतिक समीकरण काफी हद तक साफ हो जाएंगे।
कौन भाजपा से बगावत कर रहा है?
कौन कांग्रेस से नाराज होकर निर्दलीय उतर रहा है?
कहां मुकाबला सीधा है?
कहां त्रिकोणीय है?
और किन वार्डों में गहलोत समर्थक सक्रिय हैं?
इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि ‘गहलोत फैक्टर’ वास्तव में कितना बड़ा है।
सबगुरु न्यूज़ का राजनीतिक आकलन
अभी की स्थिति में वार्ड 4 को गहलोत फैक्टर का सबसे मजबूत केंद्र माना जा सकता है। इसके बाद अजमेर उत्तर के वे वार्ड महत्वपूर्ण होंगे जहां भाजपा के भीतर असंतोष या मजबूत स्थानीय दावेदार मौजूद हैं। यदि गहलोत केवल अपनी पत्नी की लड़ाई तक सीमित रहते हैं तो इसका प्रभाव सीमित रहेगा।
लेकिन यदि वे दूसरे वार्डों में भी सक्रिय होकर भाजपा के असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ लेते हैं, तो यह चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस से आगे बढ़कर भाजपा बनाम कांग्रेस बनाम भाजपा से निकला बागी वोट बन सकता है। और अगर ऐसा हुआ तो कुछ वार्डों में जीत का फैसला बड़े वोट बैंक से नहीं, बल्कि कुछ हजार वोटों के बिखराव से होगा।
सबसे बड़ा सवाल-पेन ड्राइव नहीं, उसका राजनीतिक असर
पेन ड्राइव में क्या है, यह जांच और प्रमाणिकता के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन फिलहाल उससे पैदा हुई राजनीतिक चर्चा ने अजमेर के निकाय चुनाव को जरूर एक नया मुद्दा दे दिया है। अब देखना यह है कि धर्मेंद्र गहलोत इस मुद्दे को वार्ड 4 की लड़ाई से निकालकर कितने वार्डों तक ले जाते हैं।
क्योंकि अजमेर निकाय चुनाव में अगर ‘गहलोत फैक्टर’ ने पांच-दस वार्डों में भी वोटों का समीकरण बदल दिया, तो परिणामों की पूरी तस्वीर प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि इस चुनाव में अब सिर्फ यह नहीं पूछा जा रहा कि अजमेर नगर निगम में कौन जीतेगा? बल्कि एक दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है-‘धर्मेंद्र गहलोत कितने वार्डों में चुनाव का गणित बदल पाएंगे?’



