अजमेर/कन्याकुमारी। विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी के अध्यक्ष ए बालकृष्णन का देहावसान हो गया है। स्वामी विवेकानन्द के आदर्शों तथा मनुष्य-निर्माण और राष्ट्र-निर्माण के कार्य को अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाले बालकृष्णन ने अपनी नश्वर देह का परित्याग कर अनन्त यात्रा पर प्रस्थान किया। उनकी अंत्येष्टि 29 अगस्त को कन्याकुमारी में होगी, जहां देशभर से विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता, शुभचिंतक एवं अनुयायी उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित करने हेतु एकत्र होंगे।
नगर संचालक डॉ श्याम भूतड़ा ने बताया कि पांच दशकों से अधिक लंबे अपने कार्यकाल में बालकृष्णन ने विवेकानन्द केन्द्र के माध्यम से देश के कोने-कोने में, विशेषकर पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम और उपेक्षित क्षेत्रों में, शिक्षा और सामाजिक सेवा के अनगिनत कार्य स्थापित किए।
1970 के दशक के प्रारम्भ में एक युवा जीवनव्रती कार्यकर्ता के रूप में वे पूर्वोत्तर भारत आए और स्वामी विवेकानन्द तथा माननीय एकनाथजी रानडे के राष्ट्र-निर्माण के विराट स्वप्न को अपने जीवन का ध्येय बना लिया। विवेकानन्द केन्द्र के अभिलेखों के अनुसार पूर्वोत्तर के आंचलिक संगठक के रूप में हुई उनकी पहली नियुक्ति के बाद वे वर्ष 1981 तक अरुणाचल प्रदेश में विभिन्न महत्वपूर्ण संगठनात्मक दायित्वों का निर्वहन करते रहे।
यह वह दौर था जब अरुणाचल प्रदेश आज से सर्वथा भिन्न स्वरूप में था—दुर्गम पर्वत श्रृंखलाएं, कठिन पर्वतीय पथ, उफनती नदियाँ और दूर-दूर बसे गांव। इन विषम परिस्थितियों के बावजूद बालकृष्णन और उनके सहकर्मी कार्यकर्ता उन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचे, जहां उस समय बहुत कम लोग जाने का साहस जुटा पाते थे।
इसी अथक प्रयास और समर्पण के परिणामस्वरूप वर्ष 1977 में अरुणाचल प्रदेश में आवासीय विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय आन्दोलन का शुभारम्भ हुआ, जो आगे चलकर पूर्वोत्तर भारत की सबसे उल्लेखनीय शैक्षिक पहलों में से एक के रूप में स्थापित हुआ। इस आन्दोलन की आधारशिला रखने और उसे विस्तार देने में बालकृष्णन की भूमिका केंद्रीय रही।
अरुणाचल प्रदेश के साथ बालकृष्णन का सम्बन्ध केवल संगठनात्मक नहीं, अपितु अत्यंत आत्मीय और भावपूर्ण था, जो जीवनपर्यन्त बना रहा। अपने अंतिम दिनों तक अरुणाचल प्रदेश, वहां के लोगों, बच्चों और केन्द्र कार्य के प्रारम्भिक दिनों की स्मृतियां उनके अन्तर्मन में सजीव बनी रहीं। उनके निकट रहे लोग बताते हैं कि अरुणाचल प्रदेश का उल्लेख होते ही उनके भीतर एक विशेष उत्साह और आत्मीयता जागृत हो उठती थी। समय के साथ केन्द्र का कार्य अरुणाचल प्रदेश से आगे बढ़कर असम, नागालैंड और पूर्वोत्तर के अन्य क्षेत्रों तक विस्तृत हुआ, जिसमें शिक्षा के साथ-साथ ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, संस्कृति और सेवा जैसे विविध आयाम सम्मिलित हुए।
विवेकानन्द केन्द्र में बालकृष्णन ने अनेक उच्चतम दायित्वों का निर्वहन किया। उन्होंने लगभग दो दशकों तक महासचिव और लगभग दो दशकों तक उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया, तथा वर्ष 2020 से केन्द्र के अध्यक्ष का दायित्व सम्भाला। इस दौरान उन्होंने स्वामी विवेकानन्द की ऐतिहासिक भारत-परिक्रमा की स्मृति में आयोजित कन्याकुमारी से कोलकाता तक की देशव्यापी यात्रा के समन्वयक के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने देश के जन-जन में राष्ट्रचेतना जागृत करने का कार्य किया।
इतने उच्च पदों और दायित्वों पर रहते हुए भी उनके व्यक्तित्व में सादगी, विनम्रता, अनुशासन और कार्य के प्रति पूर्ण समर्पण सदैव झलकता रहा। जो भी दायित्व उन्हें सौंपा गया, उन्होंने उसे अपना जीवन-धर्म मानकर पूर्ण निष्ठा के साथ निभाया। उनकी यही सरलता और तपस्वी स्वभाव उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान रही। वे अंत तक एक सरल, समर्पित एवं कर्मयोगी जीवनव्रती कार्यकर्ता बने रहे।
बालकृष्णन का जीवन इस तथ्य का सशक्त प्रमाण है कि शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का साधन नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, सांस्कृतिक मूल्यों के संचार और राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम भी है। उनके जीवन-कार्य का व्यापक प्रभाव आज पूर्वोत्तर भारत के शिक्षा, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, संस्कृति और सेवा-कार्यों में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। विवेकानन्द केन्द्र के शैक्षिक आन्दोलन से संस्कारित होकर निकली विद्यार्थियों की अनेक पीढ़ियां आज भी उनके इस अवदान की जीवंत साक्षी हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी बालकृष्णन के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उनके सामाजिक सेवा में उल्लेखनीय योगदान को स्मरण किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि बालकृष्णन ने अपने जीवन के पांच दशकों से अधिक समय स्वामी विवेकानन्द के आदर्शों और समाज-सेवा को समर्पित किया, तथा पूर्वोत्तर भारत के साथ उनका विशेष एवं गहरा जुड़ाव रहा। प्रधानमंत्री ने शिक्षा, सामाजिक सेवा और राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का भी विशेष उल्लेख किया। देश के अनेक अन्य गणमान्य व्यक्तियों और संगठनों ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें एक सच्चे कर्मयोगी और तपस्वी जीवनव्रती कार्यकर्ता के रूप में स्मरण किया है।



