अजमेर। पर्युषण पर्व के समापन अवसर पर पुष्कर रोड स्थित श्री विजय कलापूर्ण सूरि आराधना भवन में क्षमापना पर्व श्रद्धा और आध्यात्मिक भाव के साथ मनाया गया। यू. पन्यास श्री मुक्ति श्रमण विजयजी महाराज, यू. मुनि श्री मुक्ति चरण विजयजी महाराज एवं पूज्य मुनि श्री मुक्तिध्यान विजयजी महाराज आदि की निश्रा में आयोजित कार्यक्रम में क्षमा के वास्तविक अर्थ और उसके आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला गया।
तपस्या से भी कठिन है सच्चे मन से क्षमा मांगना
प्रवचन के दौरान पूज्य मुनिश्री ने कहा कि लंबे उपवास करना, मासक्षमण जैसी कठिन तपस्याएं करना साधना का हिस्सा हैं, लेकिन वर्षों से चले आ रहे मनमुटाव और वैमनस्य को समाप्त कर सामने वाले के पास जाकर क्षमा मांगना उससे भी कठिन हो सकता है।
उन्होंने कहा कि जब दो व्यक्तियों के बीच लंबे समय से विवाद, क्लेश या कटुता बनी हो और संबंध इतने बिगड़ चुके हों कि दोनों एक-दूसरे को अपना विरोधी मानने लगें, तब अहंकार छोड़कर आगे बढ़ना और ‘मिच्छामि दुक्कडं’ कहना वास्तविक क्षमापना की भावना है। क्षमा केवल शब्दों तक सीमित न रहकर मन से हो, तभी पर्युषण पर्व की साधना सार्थक मानी जा सकती है।
450 वर्ष पुराना प्रसंग सुनाया
मुनिश्री ने क्षमा की इसी भावना को समझाने के लिए करीब 450 वर्ष पुराने मेड़ता सिटी के प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने पूज्य धर्मसागरजी की क्षमापना से जुड़े प्रसंग के माध्यम से बताया कि सच्ची क्षमा व्यक्ति के भीतर के अहंकार और द्वेष को समाप्त करने का माध्यम बनती है।
तपस्वियों का किया बहुमान
क्षमापना पर्व के अवसर पर पूज्य पन्यास प्रवर की निश्रा में भक्तामर तप सहित 3, 5, 8 एवं इससे अधिक उपवास की तपस्या करने वाले तपस्वियों का भी सम्मान किया गया। श्री जैन श्वेतांबर तपागच्छ संघ की ओर से तपस्वियों का बहुमान कर उनकी तपस्या की अनुमोदना की गई।
कार्यक्रम में सुरेखा करनावट, एकता मुनोत, अरुण मेहता, आयुष भंडारी और अशोक सियाल सहित अन्य तपस्वियों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम के दौरान पारणा का लाभ नरपत राज एवं उदित भंडारी ने लिया। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने पर्युषण पर्व के मूल संदेश क्षमा, आत्मसंयम और आपसी वैमनस्य को समाप्त करने का संकल्प लिया।



