चैत्र मास नवीन ऊर्जा सृजन का है काल

what is chaitra month

ब्रह्मांड मे प्रतिक्षण ऊर्जा का सृजन नियमित रूप से होता रहता है। हम भी इसी ब्रह्मांड के पिंड है अतः हमारे शरीर को भी प्रतिक्षण ऊर्जा मिलती रहती है। चैत्र मास सदा विशेष प्रकार की ऊर्जा का सृजन करता है। पृथ्वी भी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर अपना एक चक्कर पूरा कर लगभग अपने मूल स्थान पर पुनः परिक्रमा के लिए आती है।

चैत्र मास में ही ब्रह्माजी ने सृष्टि का सृजन किया था ऐसी मान्यता है ।इसी मास मे महागौरी पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना विवाहिताएं व अविवाहितों करती हैं तथा ईसर गणगौर की सवारियां निकाली जाती है।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक शक्ति की विशेष आराधना कर लंका पर विजय प्राप्त की थी। चैत्र की पूर्णिमा को ही पवन पुत्र हनुमान का जन्म हुआ था।

राजा विक्रमादित्य ने भी इसी मास शको पर विजय प्राप्त कर नया संवत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही शुरू किया जो विक्रम संवत के नाम से आज भी प्रसिद्ध है ओर इसी दिन से हिन्दू नववर्ष का प्रारंभ होता है।

ज्योतिष पंचांग भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है जिसमे ग्रह नक्षत्र योग करण तिथि वार का लेखा जोखा होता है ।इसी दिन पंचांग सुनने की प्रथा भी है।

यह सभी बातें इस बात का प्रमाण है कि चैत्रीय मास नवीन ऊर्जा के सृजन का विशेष काल है।हर साल आकाशीय ग्रह नक्षत्रों की स्थितियां एक जैसी नहीं होती है लेकिन पृथ्वी परिक्रमा कर पुनः अपने स्थान पर आ जाती है, जहां जाती हुई सर्दी व आती हुई गर्मी का मध्यकाल होता है।

प्रकृति का धर्म समस्त प्राणीयों के लिए है। अत: इस काल में आस्तिक हो या नास्तिक यह बात मायने नहीं रखती वरन् प्रकृति के बदलावनुसार वो अपने आप को ढाल ले। खाना, पीना, रहना, सोना, चित, स्वभाव, वाणी आदि पर संयम बनाए रखे। बुद्धि व मन व योजना को सकारात्मक ढंग से सोचे।

बैर विरोध की भावना से काम ना कर प्रेम व शान्ति बनाए रखने का प्रयास करे।निश्चित रूप से आप के शरीर में नई ऊर्जा का सृजन होगा जिससे जीवन के सभी उदेश्य पूरे होंगे। प्रकृति का नियम यही है। यह सब की है ओर सब इसका लाभ उठाएं। यह सब प्रवचन या उपदेश नहीं है वरन प्रकृति का संदेश है। चैत्र मास में नव ऊर्जा का सृजन कर लाभ उठाएं।