जैन धर्म जीवन जीने की एक पूर्ण कला : भजनलाल शर्मा

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डीडवाना-कुचामन। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने जैन धर्म को केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पूर्ण कला बताते हुए कहा है कि इस धर्म के पंच महाव्रत वर्तमान भौतिकवादी युग में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने सदियों पहले थे।

शर्मा शुक्रवार को डीडवाना-कुचामन जिले में लाडनूं के जैन विश्व भारती परिसर में आयोजित सुधर्मा सभा प्रवचन हॉल के लोकार्पण समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संत, मुनि, महंत समाज को दिशा देने का काम करते है तथा हमारी समृद्ध संस्कृति को दुनियाभर में पहुंचाते है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य है कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखते हुए उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।

उन्होंने कहा कि आचार्यश्री महाश्रमणजी का पधारना राजस्थान के लिए अत्यंत सम्मान और गौरव का विषय है। जैन विश्व भारती द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में सुधर्मा सभा का लोकार्पण भी हो रहा है। यह आने वाले समय में मानवीय मूल्यों और धार्मिक शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बनेगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जैन धर्म अहिंसा का संदेश देकर प्रकाश स्तंभ की तरह मानवता को दिशा दिखा रहा है। जैन दर्शन ने ‘जियो और जीने दो’ का जो मूलमंत्र दिया है, वह अब पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा आधार बन चुका है। उन्होंने कहा कि इस धर्म की यह विशेषता रही है कि इसने हमेशा प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने की शिक्षा दी है। अब जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से चिंतित है, तब जैन धर्म के सिद्धांत हमें यह बताते हैं कि संयम और सादगी के बिना मानवता का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।

शर्मा ने कहा कि आचार्यश्री महाश्रमणजी मानवीय मूल्यों के जीवंत प्रतीक हैं। इनकी साधना, ज्ञान और त्याग लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव कल्याण और धर्म प्रचार के लिए समर्पित कर दिया है। उन्होंने कहा कि आचार्य जी ने जैन धर्म की प्राचीन परंपराओं को आधुनिक समय के साथ जोड़कर एक नई दिशा दी है।

उनका यह योगदान केवल जैन समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए वरदान है। उनकी शिक्षाओं में जो सरलता और व्यावहारिकता है, वह हर वर्ग के लोगों तक पहुंचती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जैन विश्व भारती ने पिछले कई दशकों में धर्म, शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में अविस्मरणीय योगदान दिया है। आचार्य तुलसी के बाद आचार्य महाप्रज्ञ ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

उन्होंने कहा कि इस संस्थान ने जैन दर्शन का प्रचार-प्रसार के साथ ही आधुनिक शिक्षा को मानवीय मूल्यों के साथ जोड़कर एक नई दिशा दी है। यहाँ संचालित शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान के साथ जीवन जीने की कला भी सिखाई जाती है। विश्व भारती ने अहिंसा और शांति के संदेश को घर-घर तक पहुंचाने का काम किया है। यह संस्थान विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और जैन दर्शन का प्रतिनिधित्व कर रहा है। उन्होंने कहा कि सुधर्मा सभा मानवीय मूल्यों का एक मंदिर है। यहां से सत्य, अहिंसा और करुणा का संदेश दूर-दूर तक फैलेगा। इस दौरान शर्मा ने आचार्यश्री महाश्रमणजी से आशीर्वचन प्राप्त किए।