नई दिल्ली। कांग्रेस ने मंगलवार को उन अटकलों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा जा रहा था कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार के साथ यहां हुयी मैराथन बैठकें राज्य में संभावित नेतृत्व परिवर्तन से जुड़ी थीं। पार्टी ने स्पष्ट किया कि इन चर्चाओं का एकमात्र ध्यान आगामी राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों पर था।
यह स्पष्टीकरण कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और कर्नाटक के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला के बीच करीब छह घंटे तक चली बंद कमरों की बैठक के बाद आया है। कर्नाटक के नेतृत्व और मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल को लेकर बढ़ती राजनीतिक चर्चाओं के बीच यह बैठक आयोजित की गई थी।
बैठकों के बाद पत्रकारों से संक्षिप्त बातचीत में कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने अटकलों को कमतर आंकने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि इन बैठकों की चर्चाएं कर्नाटक में राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों की तैयारियों के साथ-साथ छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों से जुड़े संगठनात्मक मामलों तक ही सीमित थीं। उन्होंने मीडिया से कर्नाटक के नेतृत्व के मुद्दे पर अटकलें न लगाने का भी आग्रह किया।
आगामी राज्यसभा चुनावों ने आंतरिक वार्ताओं को और जटिल बना दिया है। कर्नाटक में 18 जून को राज्यसभा की चार सीटों के लिए मतदान होना है, और विधानसभा में अपनी संख्या बल के कारण कांग्रेस के आसानी से तीन सीटें जीतने की उम्मीद है। इसलिए उम्मीदवारों का चयन वफादारी, प्रतिनिधित्व और प्रतिस्पर्धी गुटीय हितों को संतुलित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कसरत के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से एकजुटता प्रदर्शित की, लेकिन मंत्रिमंडल में फेरबदल या औपचारिक नेतृत्व के खाके पर किसी घोषणा के न होने से अटकलों को और बल मिला है। बैठकों के बाद सिद्दारमैया और शिवकुमार दोनों ने ही पत्रकारों के सवालों के जवाब देने से परहेज किया, जिससे इस बात को लेकर उत्सुकता बढ़ गई कि क्या चर्चा घोषित एजेंडे से आगे तक गई थी।
पार्टी के सार्वजनिक इनकार के बावजूद, असामान्य रूप से लंबी परामर्श प्रक्रिया और कांग्रेस आलाकमान तथा कर्नाटक के शीर्ष नेताओं के बीच अलग-अलग बातचीत के दौर ने इन सवालों को और हवा दे दी है कि क्या नेतृत्व श्री सिद्दारमैया और शिवकुमार के खेमों के बीच तनाव को कम करने का प्रयास कर रहा था।
ये बैठकें कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय पर हुईं, जहां सरकार के आधे कार्यकाल के करीब पहुंचने पर दोनों नेताओं के बीच सत्ता की साझेदारी की सहमति की अफवाहें फिर से उभर आई हैं।
शिवकुमार के समर्थकों का लंबे समय से दावा रहा है कि एक अनौपचारिक व्यवस्था थी जिसके तहत ढाई साल बाद वे मुख्यमंत्री का पद संभालेंगे, हालांकि कांग्रेस नेतृत्व ने कभी भी आधिकारिक तौर पर ऐसे किसी समझौते की पुष्टि नहीं की है।
पार्टी सूत्रों ने संकेत दिया कि चुनावी रणनीति के अलावा, नेतृत्व ने कर्नाटक के व्यापक राजनीतिक माहौल की भी समीक्षा की, जिसमें शासन का प्रदर्शन, संगठनात्मक एकता और विधायकों से प्राप्त प्रतिक्रिया शामिल थी। माना जा रहा है कि सुरजेवाला ने सिद्दारमैया सरकार का विस्तृत मूल्यांकन, सत्ता विरोधी लहर से जुड़ी चिंताएं और उत्तराधिकार को लेकर लंबे समय से बनी अनिश्चितता के राजनीतिक प्रभाव की रिपोर्ट पेश की।
अंदरूनी सूत्रों के अनुसार नेतृत्व को ऐसी प्रतिक्रिया मिली है जिससे पता चलता है कि नेतृत्व परिवर्तन पर लगातार लग रही अटकलें राज्य के शासन और पार्टी के भीतर आंतरिक अनुशासन को प्रभावित कर रही हैं। यह चिंताएं भी हैं कि निरंतर गुटीय प्रतिद्वंद्विता 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस सरकार को कमजोर कर सकती है।
दिल्ली में औपचारिक बैठकों से पहले, सिद्दारमैया ने कथित तौर पर कर्नाटक भवन में अपने वफादार माने जाने वाले मंत्रियों के साथ सुबह के नाश्ते पर एक बैठक की, जिसे व्यापक रूप से विधायक दल के भीतर शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा गया। कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने मंत्री पद और संगठनात्मक जिम्मेदारियों की मांग कर रहे विधायकों को समायोजित करने के लिए मंत्रिमंडल में फेरबदल की मांगों को भी दोहराया है।
कर्नाटक कांग्रेस के भीतर कई महीनों से मंत्रिमंडल में फेरबदल की बहस एक विवादास्पद मुद्दा बनी हुई है। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की निर्णायक जीत में भूमिका निभाने वाले कई विधायक मंत्री पद या बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी के लिए दबाव बना रहे हैं। इतना तो तय है कि कोई भी फेरबदल राजनीतिक रूप से संवेदनशील होना ही है क्योंकि यह सरकार के भीतर सावधानीपूर्वक संतुलित जातिगत, क्षेत्रीय और गुटीय समीकरणों को बिगाड़ सकता है।



